दो दशक से, गुजरात बीजेपी का गढ़ बना हुआ है. फरवरी 2016 में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि गुजरात संघ परिवार की विचारधारा की ‘प्रयोगशाला’ है. लेकिन अगर आप सोचते हैं कि हमेशा से राज्य में कांग्रेस विरोधी लहर रही है, तो आप गलत हैं. देश के अन्य राज्यों की तरह ही, आजादी के बाद गुजरात में भी कांग्रेस ही सत्ता में रही. 1962 से लेकर 1972 तक के 3 विधानसभा चुनावों में इंडियन नेशनल कांग्रेस ने विपक्ष को ध्वस्त करते हुए न सिर्फ सबसे अधिक सीटें जीतीं बल्कि वोट शेयर भी बहुत अधिक लेकर आई. 

Gujarat polls: Dhoraji seat a prestige issue for Hardik Patel | गुजरात चुनावः हार्दिक के लिए प्रतिष्ठा का मुद्दा बनी धोराजी सीट

Gujarat polls: Dhoraji seat a prestige issue for Hardik Patel | गुजरात चुनावः हार्दिक के लिए प्रतिष्ठा का मुद्दा बनी धोराजी सीट

1960 में गुजरात गठन से पहले कांग्रेस बंबई राज्य में सत्ता में थी, जो आज के महाराष्ट्र और गुजरात को मिलाकर बना राज्य था. कांग्रेस ने गुजरात में सरकार के हर कार्यकाल को 1990 तक पूरा किया. हालांकि, 1995 का वक्त भी आया जब बीजेपी ने केशुभाई पटेल के नेतृत्व में राज्य के चुनावों में जबर्दस्त जीत हासिल की.

केशुभाई पटेल की सरकार राज्य में बमुश्किल 2 साल ही सत्ता में रह सकी. इसके लिए जिम्मेदार रहे शंकरसिंह वाघेला, जिन्होंने पार्टी में दो फाड़ किया. लेकिन यहां से शुरू हुआ भगवा पार्टी का सफर 22 साल बाद भी जारी है. 2001 में राज्य के मुख्यमंत्री बने नरेंद्र मोदी ने लगातार 4 बार यहां के सीएम रहे.

हालांकि, पिछले कुछ सालों से कुछ मुद्दे राज्य की राजनीति में हावी होते रहे हैं. इसमें सबसे अहम पाटीदारों को आरक्षण से जुड़ा हुआ है. पाटीदार आरक्षण आंदोलन ने बीजेपी को दिसंबर में हो रहे विधानसभा चुनाव में मुश्किल दौर में पहुंचा दिया है. बीजेपी के परंपरागत वोट बैंक में कांग्रेस इस बार सेंध लगाने की कोशिश में है, खासकर ग्रामीण इलाकों में. इन सब बातों पर ही लेकिन राज्य का विधानसभा चुनाव इस बार एकतरफा नहीं होने जा रहा है. 

ओपिनियन पोल: गुजरात में 22 साल बाद फिर बनेगी बीजेपी की सरकार

ओपिनियन पोल: गुजरात में 22 साल बाद फिर बनेगी बीजेपी की सरकार

बीजेपी के लिए, विधानसभा चुनाव में एक जीत केंद्र में उसकी सरकार के जीएसटी और नोटबंदी के फैसलों पर जनता की मुहर होगी. जबकि कांग्रेस के लिए एक जीत 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले उसे मजबूत करने का काम करेंगे.

गुजरात में कांग्रेस का स्वर्णिम काल
1962 में, राज्य में पहली बार विधानसभा चुनाव हुए थे. उस चुनाव में कांग्रेस को 154 सदस्यीय विधानसभा में से 113 सीटों पर जीत मिली थी. विपक्षी दल स्वतंत्र पार्टी को सिर्फ 26 सीटें मिली जबकि प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने 7 सीटों पर जीत दर्ज की थी.

कांग्रेस ने राज्य में 1967 से लेकर 1985 तक के चुनावों में इसी तरह की जीत हासिल की. 1967 में कांग्रेस ने 168 विधानसभा सीटों में से 93 पर जीत हासिल की जबकि स्वतंत्र पार्टी को 66 सीटों पर विजय मिली. 1972 में, कांग्रेस ने इतिहास रचते हुए 168 सदस्यीय विधानसभा में से 140 पर विजय प्राप्त की. जबकि भारतीय जनसंघ और सीपीआई को क्रमशः 3 और 1 सीट ही मिल सकी.

1975 के चुनावों में भी कांग्रेस का विजयी रथ दौड़ा. 182 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी ने 75 सीटें हासिल की, जबकि कांग्रेस से ही टूटकर बनी इंडियन नेशनल कांग्रेस (O) ने 56 सीटों पर विजय हासिल की. हालांकि 1980 में कांग्रेस (आई), जो इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाला धड़ा था, उसने धमाकेदार मौजूदगी दर्ज कराई और 182 में से 141 सीटें जीतीं. यही वो साल था, जब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने राज्य में पहली बार चुनाव लड़ा था और 9 सीटें जीत सकी थी. 

gujarat-bjp-wins-municipality-elections-bypolls | गुजरात में BJP के लिए शुभ समाचार, निकाय उप चुनाव में मारी बाजी

gujarat-bjp-wins-municipality-elections-bypolls | गुजरात में BJP के लिए शुभ समाचार, निकाय उप चुनाव में मारी बाजी

1985 के अगले चुनाव में कांग्रेस ने 149 सीटें जीतीं थीं जबकि बीजेपी ने दो सीटें अधिक बढ़ा ली थीं.

बीजेपी का आरंभ
1990 वह साल था जब राज्य में पहली बार कांग्रेस की जमीन खिसकी. पार्टी को सिर्फ 33 सीटों पर जीत मिली जबकि जनता दल ने 70 सीटों पर मजबूत जीत दर्ज की. बीजेपी को 67 सीटों पर विजय मिली. बीजेपी और जनता दल ने मिलकर पहली गैर-कांग्रेस सरकार का गठन किया. चिमनभाई पटेल राज्य के सीएम बने.

आश्चर्यजनक रूप से, बीजेपी-जनता दल की सरकार ज्यादा दिन तक सत्ता में नहीं रह सकी. अक्टूबर 1990 में ये गठबंधन टूट गया लेकिन चिमनभाई पटेल कांग्रेस के 33 विधायकों के समर्थन से मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने में कामयाब हो गए. 

गुजरात के लिए कांग्रेस का घोषणापत्र, कर्ज माफी, पाटीदारों को आरक्षण का वादा

गुजरात के लिए कांग्रेस का घोषणापत्र, कर्ज माफी, पाटीदारों को आरक्षण का वादा

हालांकि, 1995 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इस राज्य में एक नए अध्याय की शुरुआत की. पार्टी ने 121 सीटें जीतीं. पार्टी की प्रमुख प्रतिद्वंदी कांग्रेस राज्य में 45 सीटों पर आकर सिमट गई. मार्च 1995 में केशुभाई पटेल राज्य में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री बने.

हालांकि, 7 महीने बाद ही केशुभाई पटेल को मजबूरन पद से इस्तीफा देना पड़ा क्योंकि पार्टी के बड़े नेता शंकरसिंह वाघेला ने उनके खिलाफ बगावत कर दी थी. बीजेपी दो धड़ों में बंट गई. वाघेला ने राष्ट्रीय जनता पार्टी का नेतृत्व किया और 1996 में कांग्रेस (आई) के विधायकों के समर्थन से राज्य के मुख्यमंत्री बने.

वहीं, केशुभाई 1998 में बीजेपी को फिर एक बड़ी जीत की दहलीज तक ले गए और फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लौटे. बीजेपी ने राज्य में 117 सीटें जीती जबकि कांग्रेस को 53 सीटें पर ही जीत मिली.