नई दिल्ली. भोजपुरी फिल्मों का इतिहास अर्द्धशतक पूरा कर चुका है. पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोरे पियरी चढ़इबो’ वर्ष 1962 में रिलीज हुई थी. उसके बाद से कई-कई वर्षों के अंतराल लेते हुए भोजपुरी सिनेमा बढ़ता रहा है. पहली भोजपुरी फिल्म के निर्माण की भी रोचक कहानी है. बताते हैं कि बॉलीवुड अभिनेता नाजिर हुसैन को देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भोजपुरी में फिल्म बनाने की सलाह दी थी. इसके बाद नाजिर हुसैन ने कहानी लिखी. यह कहानी बॉलीवुड के कई जाने-माने निर्देशकों को इतनी पसंद आई कि इस पर हिन्दी में फिल्म बनाने के लिए नाजिर हुसैन से कहानी मांगी. लेकिन हुसैन ने सबको इनकार करते हुए कहा था, ‘फिलिमवा तो बनबे करी, बाकी भोजपुरिए में बनी’. इसके बाद नाजिर हुसैन कई फिल्म फाइनेंसरों से मिलते रहे, लेकिन कोई भी निर्माता भोजपुरी में फिल्म बनाने को लेकर दांव लगाने को तैयार नहीं हुआ. आखिरकार विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी से नाजिर हुसैन की मुलाकात हुई और वे इस फिल्म को बनाने के लिए तैयार हो गए.

बैलगाड़ी से सिनेमा देखने पहुंचते थे लोग
नाजिर हुसैन की भोजपुरी भाषा में ही फिल्म बनाने की जिद, भोजपुरी की फिल्मों के लिए वरदान साबित हुई. आज सैकड़ों की तादाद में भोजपुरी फिल्में बन रही हैं और उसे लाखों दर्शक मिल रहे हैं. न सिर्फ बिहार और उत्तर प्रदेश, बल्कि देश के कई अन्य राज्यों से लेकर विदेशों में भी भोजपुरी फिल्में अपना झंडा बुलंद कर रही हैं. 1962 में रिलीज हुई ‘गंगा मइया तोरे पियरी चढ़इबो’ महज पांच लाख रुपए में बनी थी. लेकिन इसकी लोकप्रियता का आलम यह था कि इस फिल्म ने 75 लाख रुपए की कमाई की. लोगों ने इसे सिर आंखों पर बैठाया. इसकी लोकप्रियता इतनी फैली कि फिल्म देखने के लिए गांव-गांव से लोग बैलगाड़ियों से शहर के सिनेमा हॉल में पहुंचते थे. इस फिल्म को हिट करने में इसके सुमधुर गीत और कर्णप्रिय संगीत का भी बड़ा योगदान था. पहली फिल्म बनने के बाद भोजपुरी में कई फिल्में बनीं, वे चली भी, लेकिन भोजपुरी फिल्मों का दौर अगले कुछ वर्षों के लिए थम गया.

भोजपुरी की पहली फिल्म का पोस्टर. इस फिल्म का मुहूर्त शॉट पटना के शहीद स्मारक पर लिया गया था. (फोटो साभारः यूट्यूब)

भोजपुरी की पहली फिल्म का पोस्टर. इस फिल्म का मुहूर्त शॉट पटना के शहीद स्मारक पर लिया गया था. (फोटो साभारः यूट्यूब)

अंतराल लेकर बढ़ता रहा भोजपुरी सिनेमा
‘गंगा मइया तोरे पियरी चढ़इबो’ की अपार सफलता के बाद भोजपुरी फिल्मों का दौर शुरू हुआ, लेकिन कुछ ही साल में इसमें विराम सा लगता नजर आया. लेकिन 1977 में एक बार फिर भोजपुरी सिनेमा ने करवट ली और पहली भोजपुरी रंगीन फिल्म ‘दंगल’ आई. इसने भोजपुरी सिनेमा को न सिर्फ जिंदा किया, बल्कि यह अहसास भी कराया कि हिन्दी की तरह भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री भी अपग्रेड हो रही है. फिल्म ‘दंगल’ के बाद अगले कुछ वर्षों तक भोजपुरी फिल्में बनती रहीं, लेकिन इसमें उल्लेखनीय जैसा कुछ नहीं था. हां, अब यह जरूर हो गया था कि अंतराल लंबे नहीं हो रहे थे. भोजपुरी सिनेमा का सुनहरा दौर वर्ष 2003 में फिर लौटकर आया, जब अभिनेता और वर्तमान में भाजपा के सांसद मनोज तिवारी की फिल्म ‘ससुरा बड़ा पैसेवाला’ आई. इस फिल्म ने सफलता का ऐसा रिकॉर्ड बनाया कि भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री ने रफ्तार पकड़ ली. तमाम आलोचनाओं और भाषा संबंधी निंदा के बावजूद आज भोजपुरी सिनेमा जिस मुकाम तक पहुंचा है, उसमें फिल्म ‘ससुरा बड़ा पैसेवाला’ का बड़ा योगदान है.

1932 से भारतीय सिनेमा में है भोजपुरी की दखल
वर्ष 1961 से पहले भोजपुरी भाषा में फिल्में नहीं बनती थीं. हां कुछेक फिल्मों में भोजपुरी या यूं कह लें कि अवधी मिश्रित भोजपुरी का ‘टच’ जरूर रहता था. 1932 में बनी ‘इंदरसभा’ फिल्म में 72 गाने थे, जिनमें से दो गीत, ‘सुरतिया दिखाय जाओ ओ बांके छैला’ और ‘ठाढ़े हूं तोरे द्वारे, बुला ले मोरे साजन रे’ भोजपुरी के थे. इसके बाद बॉलीवुड के मशहूर निर्देशक महबूब ने 1943 में एक फिल्म बनाई, जिसमें हिरोइन नरगिस थीं. नरगिस की मां जद्दनबाई ने महबूब से कहा कि वह फिल्म में एक ठुमरी का सिचुएशन रखें. नायिका की मां की मांग थी, महबूब को फिल्म में न चाहते हुए भी वह सीन क्रिएट करना पड़ा. इसके बाद फिल्म में ठुमरी रखी गई, ‘बाबू दरोगाजी कवने कसूरबा भइल सैंइया मोर…’. फिल्म के रिलीज होने के बाद यह गाना खूब हिट हुआ. इसके बाद भी फिल्मों में भोजपुरी-पुट के उदाहरण मिलते हैं. चाहे 1950 के दशक में बनी ‘नदिया के पार’ हो या 1962 में बनी ‘गोदान’, सभी में भोजपुरी भाषा का खूब इस्तेमाल हुआ है.