नई दिल्ली. पूरे भारत को उत्तर-पूर्व से जोड़ने वाली एक सड़क है राष्ट्रीय राजमार्ग 57. इसे ईस्ट-वेस्ट कॉरीडोर भी कहते हैं. बिहार की राजधानी पटना से जब आप 100 किलोमीटर दूर मुजफ्फरपुर से पूर्णिया की तरफ बढ़ेंगे तो यही सड़क आपको गांव, नगर, शहर, खेत, नदी और तालाबों के रास्ते फारबिसगंज तक पहुंचाएगी. और इसी रास्ते में पड़ेगा कोसी महासेतु. महासेतु इसलिए, क्योंकि यह कोसी नदी, या यों कह लें महा-नदी पर बना है. कोसी को महा-नदी क्यों कहेंगे, इसे जानने-समझने के लिए आपको बिहार में इस नदी तक जाना होगा. अगर समय है तो जाइए और कोसी को देख आइए. कोसी, गंगा जैसी नहीं है कि आपको पावन कर देगी. इसने इतिहास में जरूर कई काले पन्ने भरे हैं, लेकिन यह यह यमुना जैसी भी नहीं है कि काली-कलूटी दिखेगी. हां, इस नदी को समझना है तो रेणु को पढ़िए. रेणु यानी फणीश्वरनाथ रेणु. गांव वाला साहित्यकार, जिसके साहित्य में दुनिया को देखने का नजरिया पैदा करने की कूवत है. इसी नदी ने बिहार के दो हिस्सों को करीब 70 वर्षों तक अलग कर के रखा. इन वर्षों के दौरान अगर यह नदी दिखती है तो बिहार के कई जिलों की जमीन को अपने पानी से उसर करती हुई या फिर सिर्फ और सिर्फ रेणु की किताबों में. आप कह सकते हैं एक भरी-पूरी नदी को फणीश्वरनाथ रेणु ने जिलाए रखा, वरना कोई सरकार कहां किसी की सुध लेती है, जो नदी की सुध लेती. इतने वर्षों के बाद भारत सरकार ने पुल बनाया, जिसे कोसी महासेतु कहते हैं. इसी पुल से गुजरते हुए आप रेणु को याद कर सहसा ठिठक जाएंगे. लगेगा, शायद वह कथाकार यहीं कहीं तो नहीं बसा है.

रेणु ने कोसी नदी को आधार बनाकर कई कहानियां लिखी हैं. इन कहानियों में कोसी है. उसमें डूबते-उतराते लोग हैं और समूचा पूर्णिया-अंचल है. रेणु के साहित्य में यह अंचल रचा-बसा है या इस साहित्य से यह अंचल उर्वर हुआ है, इस पर साहित्यकार जानें और उनका काम! हम तो ग्रामीण अंचल के मनोभाव, स्वभाव और उससे ज्यादा उसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने वाले रेणु को जानते हैं. जिनके साहित्य में सिर्फ एक बार डुबकी लगानी पड़ती है, फिर आप गोते दर गोते लगाते जाते हैं. आपको बस याद रहती है, कोसी, माटी और वहां के मानुष. मुझे लगता है, कहानी के शिल्प और उसके व्याकरण की तकनीकी समझ आम पाठकों को नहीं होती, वह तो कथा पढ़ता है, खुद को जोड़ता है, कथा में अपने आप को ढूंढ़ता है, उसकी भौगोलिकता को समझता है. रेणु इसीलिए लोक कथाकार हो जाते हैं, क्योंकि उनके साहित्य में लोक है और उसकी बातें हैं. ‘मैला आंचल’ पढ़ते हुए आप मेरीगंज चले जाते हैं, तो ‘परती परिकथा’ के साथ अचानक ‘कोसी नदी’ से खुद को जोड़ने लगते हैं. ‘ठेस’ में आप खुद को ‘सिरचन’ के मनोभावों से जोड़ते हैं तो ‘आदिम रात्रि की महक’ में एक स्टेशन पर खुद को बैठा हुआ पाते हैं. यही रेणु की विशेषता है जो पाठक के लिए पूंजी बन जाती है, जब वह कहता है कि उसने रेणु को पढ़ा है. आज रेणु की पुण्यतिथि है. रेणु ने कहानियां ढेर सारी लिखी हैं. उनकी कुछ कविताएं भी हैं. उन्हें याद करते हुए उनकी यह कविता पढ़ते हैं.

 

मिनिस्टर मंगरू
‘कहां गायब थे मंगरू?’-किसी ने चुपके से पूछा.
वे बोले- यार, गुमनामियां जाहिल मिनिस्टर था.
बताया काम अपने महकमे का तानकर सीना-
कि मक्खी हांकता था सबके छोए के कनस्टर का.

सदा रखते हैं करके नोट सब प्रोग्राम मेरा भी,
कि कब सोया रहूंगा औ’ कहां जलपान खाऊंगा.
कहां ‘परमिट’ बेचूंगा, कहां भाषण हमारा है,
कहां पर दीन-दुखियों के लिए आंसू बहाऊंगा.

‘सुना है जांच होगी मामले की?’ -पूछते हैं सब
ज़रा गंभीर होकर, मुंह बनाकर बुदबुदाता हूं!
मुझे मालूम हैं कुछ गुर निराले दाग धोने के,
‘अंहिसा लाउंड्री’ में रोज मैं कपड़े धुलाता हूं.