प्यार अकेला नहीं जी सकता… जीता है तो दो लोगों में…मरता है तो दो मरते हैं. इस भागती दुनिया में अनकहे प्यार को परिभाषित करना वाकई एक नए आयाम की रचना को गढ़ने जैसा है. ‘अक्टूबर’ भी ऐसी ही है.  बीते मौसम के ठूंठ में नई कोंपल सी फूटती.  ऐसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर नहीं बल्कि दिलों पर राज करती हैं.  

कलाकार- वरुण धवन, बनिता संधू, गीतांजलि राव
निर्देशक- शूजित सरकार
मूवी टाइप-Drama
स्टार-3

कहानी-  होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई करनेवाला डैन (वरुण धवन) एक फाइव स्टार होटल में इंटर्नशिप कर रहा है. हालांकि उसका वहां भी किसी काम में मन नहीं लगता. उसकी ऊल-जुलूल हरकतों की वजह से उस कई बार डांट पड़ती है बल्कि होटल से निकालने तक की नौबत आ जाती है. लेकिन उसी होटल में उसकी बैचमेट शिवली, डैन के बिल्कुल विपरीत है. वो बहुत मेहनती और अनुसानप्रिय है स्टूडेंट है. दोनों के बीच कोई भी ऐसा सीन नहीं फिल्माया गया है जिससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सके कि दोनों में बेहद प्यार था, हां…लेकिन ऐसा कुछ जरूर था जिसे महसूस किया जा सकता था. होटल में पार्टी के दौरान शिवली के साथ एक हादसा हो जाता है जिसकी वजह से वो कोमा में चली जाती है. हादसे के वक्त बस एक चीज महत्वपूर्ण थी कि शिवली में अपने दोस्तों से डैन के बारे में पूछा था. शिवली कोमा में चली जाती है. इसका डैन के ऊपर गहरा असर होता है वो दिन-रात अस्पताल के चक्कर काटता है. ज्यादा से ज्यादा वक्त कोमा में पड़ी शिवली के वक्त गुजारने लगता है. जिससे डैन के घर परिवार वाले,  दोस्त…ऑफिस के लोग खफा होते हैं लेकिन इन सबका डैन के ऊपर कुछ असर नहीं पड़ता. शायद वो शिवली से प्यार करने लगता है ये जानते हुए भी कि पता नहीं बेहोश पड़ी शिवली के मन में उसकी लिए कोई अहसास है भी या नहीं. इस अनकहे प्यार का अंत क्या होता…वहीं जो हम सोचते हैं..जो चाहते हैं या फिर कुछ और…? इसके लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी. एक नज़र देखिए फिल्म का ट्रेलर

अभिनय- अपने अभिनय और हाजिरजवाबी से सबको हंसाने वाले वरुण धवन का इस बार आपको एक नया अंदाज देखने को मिलेगा. इसमें न वरुण का नाच गाना है. न कॉमेडी. न रोमांस, लेकिन जो है वो आपको वरुण के अभिनय का कायल कर देगा. शिवली की भूमिका में बनिता संधू अपनी आंखों के हाव-भावों से किरदार में जान डाल देती है. शिवली की मां का रोल करने वाली गीतांजलि राव एक सहज…सशक्त किरदार में नज़र आईं हैं.

October poster

कुछ और भी-  शूजित सरकार ने इस फिल्म में अनकहे प्यार की परिभाषा गढ़ने का प्रयास किया है. लेखिका जूही चतुर्वेदी ने अपने लेखन के जरिए शूजित की सहजता और संवेदनशीलता को बेहतरीन ढंग से पिराया है. ‘जुड़वा-2’, ‘मैं तेरा हीरो’, ‘दिलवाले’, ‘बदलापुर’, ‘एबीसीडी-2’ और ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनियां’ में काम करने वाले वरुण धवन फिल्म में अपने किरदार के साथ न्याय करते नज़र आए हैं. ‘अक्टूबर’ का बैग्राउंड म्यूजिक शानदार है. फिल्म में जबर्दस्ती कोई गाना नहीं ठूसा गया है. वरुण धवन ने इस रोल के लिए काफी मेहनत की है  जिसमें फर्श की सफाई से लेकर कपड़ों की धुलाई और मच्छर मारने तक शामिल हैं. यही नहीं उन्हें इस कैरेक्टर के लिए टॉयलेट तक साफ करनी पड़ी हैं. फिल्म का नाम अक्टूबर इसलिए है क्योंकि श‍िवली को हर साल अक्‍टूबर महीने का इंतजार रहता था, इस महीने हरसिंगार के फूल ख‍िलते हैं. श‍िवली को ये फूल बहुत प्र‍िय होते हैं. लीक से हटकर फिल्म देखने के शौकीन हैं तो ये फिल्म आपको पसंद आएगी, वरना आप बोर हो सकते हैं.

 

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