चंपारण: आज चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह के 101 साल पूरे हो गए हैं. इस मौके पर आयोजित शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिरकत किया. एक शताब्दी पहले महात्मा गांधी ने अपने सत्याग्रह का एक्सपेरिमेंट चंपारण से ही शुरू किया था. अंग्रेजों के खिलाफ गांधी जी ने जो लड़ाई चंपारण से शुरू की उसके बारे में क्या आप ये बातें भी जानते हैं…

– महात्मा गांधी के सत्याग्रह का जन्म चंपारण की धरती पर ही हुआ था. साल 1917 में पहली बार यहीं सत्याग्रह किया गया.

– महात्मा गांधी चंपारण सिर्फ किसानों का हाल देखने पहुंचे थे. यहां पहुंचने के बाद उन्होंने गरीबी और बदहाली की जो हालत देखी, उसके बाद उन्होंने आजीवन घुटनों तक की धोती पहने का फैसला ले लिया, ताकि कपड़ों पर खर्च कम हो.

– महात्मा गांधी जिस किसान की व्यथा सुनकर चंपारण आए थे, उनका नाम राजकुमार शुक्ल था. उस वक्त गांधी जी को पता नहीं था कि वह सत्याग्रह आंदोलन करने जा रहे हैं. राजकुमार शुक्ल चम्पारण का एक अनपढ़ किसान था.

– तब बिहार विभाजित नहीं हुआ था. चंपारण के किसानों पर अंग्रेजों का दबाव बढ़ गया था. किसानों को जबरन नील के पौधों की खेती का दबाव डाला जाने लगा. यहां तक कि अंग्रेजों ने किसानों के लिए यह नियम लागू कर दिया कि 20 में से 3 खेत नील के पौधे उगाए जाएंगे. इसे तीनकाठिया का नाम दिया गया.

चंपारण पहुंचने के बाद गांधी ने जब मामले की जांच शुरू करनी चाही तो लोगों ने खुद ही उन्हें रोक दिया. इसलिए वह अपनी जांच चंपारण से ना शुरू कर मोतीहारी के बाबू गोरख प्रसाद के घर शुरू किया.

– जांच के दौरान ही गांधी जी अक्सर हाथी पर बैठकर गांव आते थे. इसी दौरान उन्हें कोर्ट से समन भेज दिया. गांधी जी पर धारा 144 का उल्लंघन करने का आरोप था. लेकिन इसके बावजूद गांधी जी ने चंपारण छोड़ने से मना कर दिया.

– 18 अप्रैल 1917 को गांधी जी मोतीहारी कोर्ट में सुनवाई के लिए उपस्थित हुए. उनके साथ 2000 से ज्यादा गांव के लोग भी थे. पहली बार ऐसी सुनवाई हुई, जिसमें आरोपी खुद यह मान रहा था कि मेरी गलती है, मैंने मान लिया. कोर्ट बेल दे रही थी और आरोपी सजा काटने पर उतारू था. सरकार को अपना केस वापस लेना पड़ा था. इसके बाद गांधी को जांच करने की लिखित अनुमति दी गई. स्वतंत्रता की ओर बढ़ाई गई यह पहली जीत थी.

– इस सर्वे में गांधी जी की मदद बाबू राजेंद्र प्रसाद, धरनिधर प्रसाद, गोरख प्रसाद, रामनास्वामी प्रसाद स्वामी, संभूसरण और अनुग्रह नारायण सिन्हा ने की थी. एक महीने के भीतर ही 4,000 लोगों ने अपना बयान दिया.

– गांधी के चंपारण में रहने और सर्वे करने को लेकर बिहार प्राधिकारी ने अपनी नाराजगी जाहिर की. इसलिए 4 जून 1917 को बिहार के लेफ्टिनेंट गर्वनर सर एडवर्ड गेट ने एक इंक्वायरी कमेटी का गठन किया.

– 11 जुलाई 1917 को चंपारण इंक्वायरी कमेटी ने अपनी बैठक शुरू कर दी और कई जांच के बाद 4 अक्टूबर को अपनी रिपोर्ट जमा की.

– 4 मार्च 1919 को आखिरकार गवर्नर जनरल ने उस दस्तावेज पर कानूनी मुहर लगा दी, जिसमें तीनकाठिया सिस्टम को खत्म करने की बात कही गई थी.