लाहौर: 14 अप्रैल को बैसाखी का त्योहार मनाने के लिए 1700 सिख श्रद्धालु भारत से पाकिस्तान के रावलपिंडी स्थित गुरूद्वारा पंजा साहिब पहुंचे हैं. पाकिस्तान गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष सरदार तारा सिंह, इवैकुई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) के सचिव तारिक खान तथा अन्य अधिकारियों ने सिख श्रद्धालुओं के विशेष ट्रेन से वाघा रेलवे स्टेशन पहुंचने पर स्वागत किया.

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक स्थलों का देख रेख करने वाली संस्था ईटीपीबी के प्रवक्ता आमिर हाशमी ने बताया, ‘‘लगभग 1700 सिख श्रद्धालु भारत से रावलपिंडी स्थित गुरूद्वारा पंजा साहिब में बैसाखी के मौके पर लगने वाले मेले में शिरकत करने आए हैं.’’

उन्होंने बताया कि मुख्य कार्यक्रम 14 अप्रैल को आयोजित किया जाएगा जिसमें बड़ी तादाद में स्थानीय सिख एवं हिंदू समुदाय के लोग हिस्सा लेंगे. उन्होने बताया कि श्रद्धालु 21 अप्रैल को वापस भारत के लिए रवाना होंगे. भारत से पाकिस्तान पहुंचे श्रद्धालुओं के साथ आए सिख नेता सरदार गुरमीत सिंह ने कहा कि यात्रियों को हमेशा पाकिस्तान के लोगों से प्यार मिला है.

क्यों मनाई जाती है बैसाखी?
बैसाखी का त्योहार फसल पकने का प्र‍तीक है. इस समय खरीफ फसल पूरी तरह से पक जाती हैं और इसकी कटाई शुरू हो जाती है. अप्रैल के महीने में मौसम में परिवर्तन भी होता है. सर्दी पूरी तरह से खत्म हो जाती है और गर्मी का मौसम शुरू हो जाता है. पंजाब और हरियाणा में बैसाखी का त्योहार दिवाली की तरह मनाया जाता है. लोग कई दिन पहले ही इसकी तैयारी शुरू कर देते हैं. तरह-तरह के पकवान बनते हैं और लोग रिश्तेदारों-दोस्तों को अपने घर बुलाते हैं और उनके घर जाते हैं. एक दूसरे को उपहार देते हैं और नाच-गाना करते हैं.

बैसाखी सिर्फ पंजाब और हरियाणा में ही नहीं, बल्कि देश के कई अन्य राज्यों में भी अलग-अलग नाम से मनाई जाती है. जैसे कि असम में इसे बिहू कहा जाता है, बंगाल में नबा वर्षा, केरल में पूरम विशु के नाम से यह त्योहार मशहूर है. पंजाबी इसे नये वर्ष की शुरुआत मानते हैं. सिखों के 10वें गुरु गोबिन्द सिंह ने बैसाखी के दिन ही आनंदपुर साहिब में साल 1699 में खालसा पंथ की नींव रखी थी, इसके साथ ही इस दिन को मनाना शुरू किया गया था. बैसाखी को मेष संक्रांति भी कहते हैं. क्योंकि इस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है.