देहरादून. उत्तराखंड के पहाड़ों में भूकंप अक्सर आते रहते हैं जिसे कई बार सामान्य बताया जाता है. एक जनवरी 2015 से अब तक 51 बार झटके आ चुके हैं. राज्य आपदा न्यूनीकरण और प्रबंधन केंद्र (डीएमएमसी) का कहना है कि यह भीषण भूकंप का संकेतक हो सकता है.

डीएमएमसी के कार्यकारी निदेशक पीयूष रौतेला के मुताबिक, उत्तराखंड के पहाड़ में अक्सर आने वाले भूकंप को सामान्य घटना बताकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए. इसे बड़े भूकंप के संकेतक के तौर पर देखना चाहिए. लंबे समय से हिमाचल प्रदेश, नेपाल और उत्तराखंड तक फैले हिमालयी क्षेत्र की मध्य भूकंपीय पट्टी में यह झटका नहीं आया है.

बता दें कि डीएमएमसी किसी तरह की आपदा में लोगों और पर्यावरण के संरक्षण लिए उत्तराखंड सरकार के तहत काम करने वाला स्वतंत्र संगठन है. इसके पास आपदा की स्थिति में कम से कम नुकसान के लिए लोगों और समुदायों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने की भी जिम्मेदारी है. रौतेला ने कहा कि उत्तराखंड का गढ़वाल क्षेत्र साल 1803 में भीषण भूकंप की चपेट में आया था. इसके बाद से तकरीबन 200 साल से हिमालयी क्षेत्र में बहुत सारी ऊर्जा बाहर नहीं निकली है.

200 साल से जमा है ऊर्जा
रौतेला ने कहा , ‘यह संचित ऊर्जा 200 से ज्यादा साल से जमा हो रही है. इसके कारण वैज्ञानिकों को आशंका है कि यह निकट भविष्य में हिमालयी क्षेत्र में बड़े भूकंप के रूप में अपना रास्ता निकाल सकती है. उत्तराखंड भी इसी क्षेत्र का हिस्सा है.’ उन्होंने बताया कि आशंका का दूसरा पहलू उत्तराखंड, पड़ोसी हिमाचल प्रदेश और नेपाल तक फैले हिमालयी मुहाने पर भूंकप की 700 किलोमीटर लंबी पट्टी है जो कि पिछले 200-500 वर्षो में किसी बड़े भूकंप में नहीं टूटी है.

आखिरी बार एक अप्रैल को लगा था झटका
यह पूछा गया कि वैज्ञानिक भीषण भूकंप किसे करार देते हैं. इस पर उन्होंने कहा कि रिक्टर पैमाने पर आठ से ज्यादा तीव्रता वाले झटके को इस श्रेणी में रख्रा जाता है. उत्तराखंड मौसम विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़े के मुताबिक एक जनवरी 2015 के बाद से राज्य के विभिन्न हिस्से में, खासकर पहाड़ी चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और रूद्रप्रयाग जिले में हल्की तीव्रता का 51 झटका लग चुका है. पहाड़ में एक महीने में औसतन दो बार हल्की तीव्रता का भूकंप आता है और आखिरी बार इस साल एक अप्रैल को पिथौरागढ़ को झटका लगा था.