नई दिल्ली. 16 अप्रैल 1853 से शुरुआत कर भारतीय रेल आज अपनी 165वीं वर्षगांठ मना रही है. डेढ़ सौ वर्षों से ज्यादा लंबे इस सफर में भारतीय रेल ने देश को लोहे की पटरियों के माध्यम से जोड़ने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है. आज देश में लगभग एक लाख किलोमीटर की दूरी में बिछाई गई रेलवे लाइनों पर रोजाना 20 हजार से ज्यादा ट्रेनें दौड़ती हैं. भारतीय रेल के सफर का इतिहास सुनहरा रहा है. इस इतिहास के पन्नों में ट्रेनों के लिए पहाड़ काटकर रास्ता बनाने, पटरियां बिछाने, पुल और स्टेशन बनाने जैसे कई कीर्तिमान दर्ज हैं. इन्हीं पन्नों में बंबई (अब मुंबई) से पुणे को जोड़ने वाली यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व धरोहर पश्चिमी घाट के किनारे की भोर घाट रेलवे लाइन का भी एक पन्ना है. यह रेलवे लाइन भारतीय इंजीनियरिंग में महत्वपूर्ण स्थान रखती है. पहाड़ों का सीना चीरकर रेलवे की पटरियां बिछाने, पुल बनाने का यह काम कितना मुश्किल था, इसे सिर्फ इस बात से समझा जा सकता है कि भोर घाट रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान 25 हजार से ज्यादा मजदूरों की जान चली गई थी. इस रेलवे लाइन के कठिन निर्माण कार्य और बेमिसाल इंजीनियरिंग पर कनाडा के स्कॉलर इआन केर ने किताब लिखी है. रेलवे की 165वीं वर्षगांठ पर आइए जानते हैं इस रेल लाइन के बारे में.

ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे ने बिछाई थी यह लाइन
तत्कालीन ब्रिटिश राज ने भारत में रेल चलाने (1853) के महज तीन साल बाद ही पश्चिमी घाट के रास्ते देश के दक्षिणी हिस्से को जोड़ने की योजना बनाई थी. वर्ष 1856 में भोर घाट रेल लाइन निर्माण की योजना बनी. करीब 8 साल में बनकर पूरी हुई यह रेलवे लाइन सह्याद्री पर्वत के ऊंचे ढलुवां रास्तों और चढ़ान पर बननी थी. इस रूट पर 15 मील लंबे ढलुवां रास्ते पर 37 जगह उतार-चढ़ाव के हैं. इस रूट पर 25 सुरंगें हैं और इतने ही करीब पुल हैं. पहाड़ के बीच एक तो रेलवे लाइन बिछाना ही टेढ़ी खीर थी, ऊपर से पुल या सुरंगों का निर्माण तो और कठिन. लेकिन अंग्रेज सरकार के चीफ इंजीनियर बर्कले ने जमीन से 2000 फीट ऊपर इस पहाड़ पर जनवरी 1856 में पटरी बिछाने का काम शुरू किया. 1863 में यह निर्माण कार्य पूरा हुआ और इसी महीने यानी 21 अप्रैल 1863 को खंडाला में बॉम्बे प्रेसीडेंसी के गवर्नर सर बर्टले फ्रेरे ने इसका उद्घाटन किया.

भोर घाट सह्याद्री पर्वत श्रृंखलाओं में आपको शानदार रेल सफर का आनंद उठाने का मौका देता है. (फोटोः @narendra IRTS)

भोर घाट सह्याद्री पर्वत श्रृंखलाओं में आपको शानदार रेल सफर का आनंद उठाने का मौका देता है. (फोटोः @narendra IRTS)

40 हजार मजदूर लगे, 25 हजार की मौत
सह्याद्री पर्वत श्रृंखला पर रेल लाइन बिछाने के कार्य पर शोध पत्र लिखने वाले इआन केर ने लिखा है कि भोर घाट रेलवे लाइन निर्माण में उस समय करीब 1.10 लाख पाउंड से ज्यादा खर्च हुए थे. प्रति किलोमीटर रेल ट्रैक बिछाने में करीब 70 हजार पाउंड की धनराशि खर्च की गई थी. इस महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट में काम करने वाले मजदूरों की संख्या साल के हिसाब से बढ़ाई गई थी. शुरुआत में 1856 में जहां 10 हजार मजदूर काम में लगे थे, वहीं 1857 में 20 हजार और आखिरी वर्ष से पहले 1861 में मजदूरों की संख्या बढ़कर 42 हजार तक हो गई थी. इआन केर ने लिखा है कि पहाड़ की कठिनाइयों के कारण इस रेल लाइन निर्माण के दौरान पानी की कमी, डायरिया, कॉलरा और इसके अलावा दुर्घटनाओं में 25 हजार से ज्यादा मजदूरों की मौत हो गई थी. दुर्घटनाओं में मरने वाले मजदूरों की संख्या का कोई आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया गया. 1859 से 1860 के दौरान प्रति दिन 10 मजदूरों की मौत विभिन्न बीमारियों या दुर्घटनाओं के कारण हो जाती थी.

मुंबई से पुणे तक की यात्रा के दौरान आप भोर घाट को देखने का लाभ उठा सकते हैं. (फोटोः @pranit)

मुंबई से पुणे तक की यात्रा के दौरान आप भोर घाट को देखने का लाभ उठा सकते हैं. (फोटोः @pranit)

मजदूरों ने कर दिया था विद्रोह
इआन केर ने लिखा है कि बंबई-पुणे (तब पूना) रेल लाइन निर्माण की कठिनाइयों से एक तरफ जहां मजदूर परेशान रहते थे, वहीं अंग्रेज सरकार के अधिकारी उनकी परेशानियों से मुंह फेरे रहते थे. अंग्रेज अधिकारी मजदूरों से काम तो पूरा लेते थे, लेकिन उन्हें समय पर वेतन नहीं मिलता था. अपने साथ हो रही अनदेखी, वेतन की समस्या और लगातार होती दुर्घटनाओं व मौतों से नाराज मजदूरों ने वर्ष 1859 में विद्रोह कर दिया. उन लोगों ने एक अधिकारी की हत्या कर दी. इसके बाद अंग्रेजी सरकार सतर्क हुई और मजदूरों की समस्याओं के समाधान के लिए अलग से अधिकारी तैनात किए गए. आखिरकार 8 वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद एक मानवीय सपना साकार हुआ. आज मुंबई-पुणे रेल रूट देश के व्यस्ततम रेल मार्गों में से एक है. इस पर चलते हुए आप भारतीय रेल के स्वर्णिम इतिहास को याद कर सकते हैं.