नई दिल्ली. संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के नाम पर या दलित राजनीति के नाम पर अंबेडकर के नाम की सियासत करने वाले ये जानते हैं कि भीमराव अंबेडकर जाति प्रथा के विरोधी थे. उन्होंने जीवनभर समाज में अछूत कहे जाने वालों के लिए आवाज उठाने का काम किया. फिर भी विडंबना है कि राजनीति में अंबेडकर का नाम जाति के लिए किया जाता है. आपको जानकर हैरानी होगी कि खुद अंबेडकर जीवनभर अपने एक सवर्ण शिक्षक की उदारता को याद करते थे. उस शिक्षक ने ही भीमराव को ‘अंबेडकर’ नाम दिया था. चंद्रशेखर भंडारी और एस.आर. गोस्वामी की पुस्तक ‘प्रखर राष्ट्रवादी डॉ. भीमराव अंबेडकर’ में इस कहानी से इतर अंबेडकर के बारे में विस्तार से बताया गया है. आज अंबेडकर की जयंती पर आइए जानते हैं बाबासाहेब के भीमराव ‘अंबेडकर’ बनने की कहानी.

मध्यप्रदेश के महू में हुआ था अंबेडकर का जन्म
भीमराव अंबेडकर के पूर्वज कोंकण प्रदेश के थे. महार जाति में उनके परिवार का बड़ा नाम था. महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में उनका स्थान था. अंबेडकर नाम का मूल अंबावाडे गांव मदनगढ़ के पास है. भीमराव के दादाजी सेना में थे. वहीं उनके पिता रामजी सैनिक स्कूल में शिक्षक थे. उनकी मां भीमाबाई अमीर सूबेदार घराने की थी. इसी परिवार के 14वें बेटे के रूप में मध्यप्रदेश के महू में 14 अप्रैल 1891 को भीमराव का जन्म हुआ. सेवानिवृत्ति के बाद रामजी का परिवार सतारा में रहा. सतारा में प्राथमिक शिक्षा समाप्त करने के बाद भीमराव हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए गोरेगांव आ गए. उन दिनों अपनी जाति के कारण उन्हें कुछ अप्रिय घटनाओं का सामना करना पड़ा था. इसलिए बचपन से ही भीमराव के मन में सामाजिक असमानता के विरुद्ध संघर्ष की नींव पड़ गई थी.

हाईस्कूल के शिक्षक की उदारता के गुण गाते थे अंबेडकर
सतारा के स्कूल में जाति संबंधी अनुभव बाल भीमराव के लिए बड़े कष्ट देने वाले थे. लेकिन इसके विपरीत भी कुछ अनुभव थे, जो उन्हें सुकून देते थे. हाईस्कूल में पढ़ते समय उनके प्रति एक सवर्ण उच्च जाति के अध्यापक की उदारता को बाबासाहेब ताउम्र याद करते थे. यह शिक्षक भीमराव के प्रति अपार वात्सल्य दर्शाते थे. स्कूल के दिनों में भीमराव के नाम के साथ ‘अंबावाडेकर’ जुड़ा हुआ था. वहीं उनके शिक्षक ‘अंबेडकर’ थे. इन्हीं स्नेही शिक्षक ने स्कूल के रजिस्टर में अपने नाम के साथ जुड़ा ‘अंबेडकर’, भीमराव के नाम के साथ भी लिखवा दिया. अपने प्रति शिक्षक के इस प्रेम को देखते हुए भीमराव ने भी यही नाम सदा के लिए अपना लिया.