नई दिल्ली. राष्ट्रकवि, पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी माखनलाल चतुर्वेदी की आज जयंती है. इनके बारे में साहित्यकार प्रभाकर श्रोत्रिय ने लिखा है, ‘माखनलाल चतुर्वेदी की कविता खड़ी बोली में रस की पहली फुहार थी. शायद सबसे पहले वे ही यह भ्रम तोड़ सकी कि खड़ीबोली में ब्रज जैसी मिठास नहीं आ सकती. भारतेंदु युग के गद्य की सारी खिलंदड़ी, व्यंग्य, ललकभरी मस्ती, दि्वेदी-युग में गुप्त गंगा की तरह जैसे धरती में कहीं गहरे उतर गई थी. माखनलालजी ने दि्वेदी-युग में रहते हुए भी अपने को भारतेंदु-युग की सर्जक चेतना से जोड़ा.’ एक पत्रकार के रूप में जहां माखनलालजी ने देश-समाज की कुरीतियों के खिलाफ कलम चलाया, वहीं साहित्यकार-कवि के रूप में उनकी कविताएं राष्ट्रबोध कराती रहीं. इसीलिए माखनलाल चतुर्वेदी रचनावली पढ़ते हुए आप डॉ. गंगाप्रसाद विमल को पढ़ते हैं, जिसमें विमलजी ने लिखा है, ‘माखनलाल चतुर्वेदी की सौंदर्य चेतना के आरंभिक बिंदु छायावादी काव्य रचनाओं में हैं, जो कलावादी प्रवृत्ति से प्रभावित है. राष्ट्रीय धारा द्वारा प्रभावित काव्य-रचनाओं में वह पुनः प्रयोजनवादी, मानवतावादी, सौंदर्य-अध्येता जान पड़ते हैं. किंतु समसामयिक काव्य-रचनाओं में हमें उनके नितांत नए रूप के दर्शन होते हैं. यहां उनकी सौंदर्य-चेतना प्रभाववादी न होकर रचनात्मक अधिक है. काव्य-भाषा के आधार पर उनकी सौंदर्य-चेतना निरंतर गतिशील और सक्षम जान पड़ती है.’

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विलक्षण प्रतिभा के धनी इस साहित्यकार, पत्रकार का जन्म आज ही के दिन मध्यप्रदेश के बावई गांव में 4 अप्रैल 1889 को हुआ था. प्रभाकर श्रोत्रिय लिखते हैं, ‘1904 में माखनलालजी ने लिखना शुरू कर दिया था और 1913-14 में उनकी कविता में धार आने लगी थी. कवि रूप में ही नहीं, पत्रकार और स्वाधीनता सेनानी के रूप में भी वे चमचमाते रहे. फिर भी न जाने क्यों उनका पहला कविता संग्रह ‘हिम किरीटनी’ 1943 में प्रकाशित हुआ.’ माखनलाल चतुर्वेदी की काव्य प्रतिभा अद्भुत थी. इसके बारे में प्रभाकर श्रोत्रिय ने लिखा है, ‘माखनलालजी में अक्षुण्ण ऊर्जा और उत्कट सृजनशीलता थी, इसी कारण वे निरंतर गतिशीलता और अदम्यता के प्रतीक बने रहे.’ आज इन्हीं राष्ट्रकवि को याद करने का दिन है. आपने उनकी प्रसिद्ध कविता, ‘पुष्प की अभिलाषा’ तो पढ़ी ही होगी, आज एक पत्रकार के रूप में चली उनकी लेखनी की एक बानगी हम दिखाते हैं. जाति व्यवस्था पर चोट करता यह लेख उन्होंने आज से सौ साल पहले लिखा था. आज इस लेख का कुछ अंश इसलिए पढ़ें क्योंकि हमने अभी ही जाति को लेकर गर्म हुए माहौल को जिया है.

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जातीय झगड़ों का उत्तरदातृत्व

किसी भी देश की दशा तब तक ठीक रहती है जब तक कि उनकी देखभाल कर दर्दों की औषधि करने का अधिकारी बनने वाला चुप होकर न बैठ जाए. एक का इस प्रकार बैठ जाना ही यह सिद्ध करता है कि वह अंतःकरण से चाहता है कि जातियों में द्वेष की आग भड़के और असंतोष की आंधी अपना कार्य परिपूर्णता पर पहुंचा दे. वह भी एक दिन होगा कि जिस दिन झगड़ों का परिणाम भयंकर होगा और उन चिड़ीमारों को ही इस प्रकार के अपराधों की संपूर्णता का उत्तरदाता बनना पड़ेगा. क्या वह जाति अपने को बहुत गुण-गौरवपूर्ण समझती है जो मूर्खता से द्वेष की आग में कुछ नीति और मूर्खता की फूंकें मारकर उसे प्रज्ज्वलित कर रही है? उसे स्मरण रखना होगा कि दूसरी जाति भी पत्थर की इमारत को जलाने के समय अग्नि की भयंकर ज्वालों को संभालने में समर्थ है और उसे अपने कपूर से बने हुए शुद्ध, पवित्र, उजले और सुगंधित वस्त्र को बहुत सावधानी से बचाना चाहिए, जिसमें सदैव, सबसे प्रथम आग लग जाने की शंका है और प्रायः सदैव उसी में प्रथम आग लगती रही है. जिसका साक्षी संसार की गत शताब्दियों का इतिहास है. हां, माना जा सकता है कि पत्थर के मंदिरों में बैठी रहने वाली जाति पत्थर हो चुकी हों, परंतु नहीं, जो किया जा रहा है, और इसे कौन कह सकता है कि वह जाति अपनी संपूर्ण आत्मशक्ति और उच्चता खोकर, निरी पत्थर हो चुकी होगी.

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यह भी सोच लेना चाहिए कि हम (भारतवासी) धर्मप्राणता दिखाते समय कितने दर्जे का पागलपन करने लगते हैं और इस पागलपन से लाभ उठाने वाली श्रेणी इस समय, हमारे मध्य में पड़कर, कैसे-कैसे सुंदर संदेशे हमारे हेतु भेज रही है. हम उस समय अपनी मूर्खता की चरम सीमा दिखाने लगते हैं. हमारा वह विचार कि ‘पवित्र ईश्वर के सामने हम सब जातियां समान हैं’, न जाने कहां चला जाता है. भारतीय झगड़ों में हमें तीन बातें विशेषता से देखने को मिलती हैं-
1. जाति की जड़ प्रकृति और सहनशीलता के रूप में हतवीर्यता.
2. जाति की मूर्खता और अपना झूठा सिक्का जमाने की चेष्टा, अपनी मूर्खता का द्वार खुला पाकर उनमें बिना विचारे घुस जाना.
3. जाति का अनुचित हस्तक्षेप, झगड़ालू जाति के मूर्खता के दरवाजों को खोल देना और उसके द्वेष के मैदान को विस्तृत कर अपने अधिकार का दुरुपयोग करना.

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कुछ मनुष्यों का समूह, चिंता और विचार में संपूर्ण समय बिताकर अंत में जातियों की मुठभेड़ का दुर्दृश्य अपनी आंखों से देखने का अवसर आने देता है और अवसर आने पर अपने पक्षवालों में मूर्खतापूर्वक दहाड़ने लगता है. एक और चिंतित कार्यकारी समूह है जिसकी अभी चलती नहीं. उस समय के व्यक्ति सोचा करते हैं कि यह भाइयों का नाश कर, जाति को रसातल में पहुंचा देनेवाला, कुकृत्य किस प्रकार बंद हो और लड़ते समय वाह-वाह कहने वालों का दल नाश हो.

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और अंत में ‘दद्दा’ की वह प्रसिद्ध कविता…

चाह नहीं, मैं सुरबाला के
गहनों में गूंथा जाऊं,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध
प्यारी को ललचाऊं,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊं,
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूं भाग्य पर इठलाऊं,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक!
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने,
जिस पथ पर जावें वीर अनेक!

(साभारः माखनलाल चतुर्वेदी रचनावली और प्रभाकर श्रोत्रिय की ‘कवि परंपराः तुलसी से त्रिलोचन)

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