नई दिल्ली. आप यदि सितार सुनते हैं तो जेहन में सबसे पहले जिसका नाम आता है, वह हैं (या थे) पंडित रविशंकर. भारत का संभवतः पहला अंतरराष्ट्रीय संगीतज्ञ. सितार को भारत से निकालकर विश्व के मंच पर प्रतिष्ठा दिलाने वाले संगीत की देवी के इस मानस पुत्र को उनकी अप्रतिम प्रतिभा और विलक्षण सितार वादन के लिए जाना जाता है. आज इन्हीं महान संगीत-विशारद की जयंती है. 7 अप्रैल 1920 को उत्तर प्रदेश के बनारस में जन्मे पंडित रविशंकर शुरुआती दिनों में अपने भाई प्रसिद्ध नर्तक उदय शंकर के साथ नृत्य-मंडली में शामिल थे. यह नृत्य-मंडली देश-विदेश का भ्रमण किया करती थी. सितार के साथ पंडित रविशंकर के जुड़ाव का कारण ये नृत्य-मंडली ही बनी थी. दरअसल, एक बार प्रख्यात सितार वादक उस्ताद अलाउद्दीन खान भी इस मंडली के साथ यूरोप की यात्रा पर गए. इसी दौरान रविशंकर ने उस्ताद से सितार सीखने की इच्छा जताई. लेकिन उस्ताद ने स्पष्ट रूप से कहा, ‘सितार सीखने के लिए नृत्य को छोड़ना होगा. संगीत की विधिवत शिक्षा के लिए नृत्य-मंडली त्याग कर मैहर में रहना होगा.’ उस्ताद अलाउद्दीन खान खुद भी मैहर में एक झोपड़ी में रहते थे. रविशंकर ने उनकी सलाह मानी और संगीत की शिक्षा के लिए मैहर आ गए. उस्ताद की झोपड़ी के पास ही उन्होंने अपना ठिकाना बनाया और अगले आठ वर्षों तक संगीत की विधिवत शिक्षा ग्रहण की.

पंडित रविशंकर की एक यादगार प्रस्तुति. (साभारः यूट्यूब)

संगीत की शिक्षा के बाद मुंबई में फिल्मी सफर
वर्ष 1944 में अपनी औपचारिक शिक्षा समाप्त कर रविशंकर ने मुंबई का रुख किया. मुंबई में रहते हुए उन्होंने बॉलीवुड की कई फिल्मों में संगीत दिया. उन्होंने कई फिल्मों में संगीत दिया, जिनमें कुछ उल्लेखनीय नाम, रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’, सत्यजीत रे की ‘अप्पू ट्रॉयोलॉजी’, चेतन आनंद की ‘नीचा नगर’, ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘धरती के लाल’, हृषिकेश मुखर्जी की ‘अनुराधा’, गुलजार की ‘मीरा’, ‘गोदान’ आदि हैं. पंकज राग लिखित किताब ‘धुनों की यात्रा’ के अनुसार पाकिस्तान के प्रसिद्ध शायर इकबाल की ऐतिहासिक रचना, ‘सारे जहां से अच्छा’ को संगीत देने वाले पंडित रविशंकर ही थे. सत्यजीत रे की चर्चित फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ में भी रविशंकर के सितार की धुन है. फिल्मों में बनाए उनके गीत न सिर्फ संगीत की आत्मा से जुड़े हुए थे, बल्कि आम फिल्मी संगीत से हटकर होते थे.

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विदेशों तक पहुंच, बीटल्स साथ युगलबंदी
भारतीय संगीत में पंडित रविशंकर का योगदान उसे सात-समुंदर पार विदेशों में प्रतिष्ठा दिलाना भी है. शुरुआती वर्षों में पंडित रविशंकर ने अमेरिका के वायलिन वादक येहुदी मेन्युहिन के साथ जुगलबंदियां की और दुनिया-भर का दौरा किया. संगीत के इन दोनों प्रतिभाओं का मिलन विश्व-संगीत में एक प्रमुख घटना मानी जाती है. इसके अलावा पंडित रविशंकर ब्रिटिश पॉप ग्रुप बीटल्स के साथ भी जुड़े. बीटल्स के साथ उन्होंने भारतीय संगीत को पश्चिमी पॉप संगीत के साथ जोड़ा. बीटल्स के साथ उनकी यह जोड़ी संगीत के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है. पंडित रविशंकर ने बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम के समय प्रसिद्ध संगीतकार जॉर्ज हैरिसन के साथ मिलकर शरणार्थियों के लिए कंसर्ट किया. इसके अलावा पंडित रविशंकर की उपलब्धियों में वर्ष 1982 के एशियाड खेल के स्वागत गीत की प्रस्तुति भी है. वहीं ज्यॉ रामपाल, यामामोतो और मिशासिता जैसे संगीतज्ञों के साथ जुड़कर पंडित रविशंकर ने भारतीय संगीत की आध्यात्मिकता को विश्व-फलक तक पहुंचाने में योगदान दिया.

(इनपुट – ‘धुनों की यात्रा’)