नई दिल्ली. भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के बाद दोनों देशों की कई नामी-गिरामी हस्तियों ने अपने-अपने पसंद की मुल्क को चुन लिया था. इनमें राजनीतिक हस्तियां भी थीं तो कला और संस्कृति से जुड़े लोग भी शामिल थे. ऐसी ही शख्सियतों में शुमार हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के पुरोधा और पटियाला घराने के उस्ताद बड़े गुलाम अली खां भी थे, जिन्होंने पाकिस्तान में रहना अख्तियार किया था. लेकिन पाकिस्तान में उस वक्त के सियासी माहौल में संगीत के लिए कोई जगह नहीं थी. उन्हें पाकिस्तान का माहौल पसंद नहीं आया, लिहाजा संगीत का यह उपासक कुछ ही दिनों के बाद वापस भारत लौट आया. यहां आने के बाद वे ताउम्र हैदराबाद में रहे और अपने संगीत से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन को नई ऊंचाइयां बख्शते रहे. संगीत के प्रति उनके इसी समर्पण को लेकर भारत सरकार ने उन्हें संगीत नाटक अकादमी सम्मान और पद्म भूषण सम्मान से नवाजा. आज संगीत के इसी मानस-पुत्र की जयंती है. आइए जानते हैं उस्ताद बड़े गुलाम अली खां के जीवन से जुड़ी चंद बातें.

यूट्यूब पर उस्ताद बड़े गुलाम अली खां का एक रेयर वीडियो.

फिल्म मुगल-ए-आजम के लिए ली 25 हजार फीस
बॉलीवुड के प्रसिद्ध संगीतकार नौशाद ने ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित हुए अपने एक साक्षात्कार में बताया था, उस्ताद बड़े गुलाम अली खां साहब मंच पर ही प्रस्तुति देते थे. उन्हें फिल्मों का पार्श्व गायन (प्लेबैक सिंगिंग) पसंद नहीं था. लेकिन फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ के लिए उसके निर्माता फिल्मकार के. आसिफ चाहते थे कि फिल्म में बड़े गुलाम अली खां की आवाज हो. के. आसिफ ने नौशाद से यह बात कही तो नौशाद ने साफ मना कर दिया. काफी मान-मनौव्वल के बाद नौशाद तैयार हुए और दोनों खां साहब के पास पहुंचे. खां साहब फिल्म में गाने की बात सुनते ही उखड़ गए. नौशाद ने आकाशवाणी को दिए इंटरव्यू में कहा था कि के. आसिफ की लगातार चिरौरी के बाद बड़े गुलाम अली खां ने तमतमाकर कहा, ‘मैं फिल्म में गाने के लिए 25 हजार रुपए लूंगा.’ नौशाद बताते हैं कि यह संगीत को समझने वाला के. आसिफ का दिल ही था कि उन्होंने तुरंत खां साहब का यह ऑफर मान लिया और उन्हें रुपए पेश कर दिए.

पं. नेहरू को भी मना कर दिया था
उस्ताद बड़े गुलाम अली खां और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से जुड़ा एक किस्सा भी काफी चर्चित रहा है. खां साहब की गायकी के मुरीद हजारों लोगों में पं. नेहरू भी शामिल थे. लेकिन सिर्फ संगीत से वास्ता रखने वाले उस्ताद को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उनके चाहने वालों में कौन आम है और कौन खास. एक बार उस्ताद कार्यक्रम के सिलसिले में कलकत्ता (अब कोलकाता) पहुंचे हुए थे. संयोग से शहर में प्रधानमंत्री नेहरू भी थे. नेहरू को जब पता चला कि खां साहब का प्रोग्राम है तो उन्होंने सोचा कि एक घंटा खां साहब को सुना जाएगा. उन्होंने खां साहब को टेलीफोन कर अपने होने की जानकारी दी और कहा, ‘तो खां साहब, इत्तिफाक ऐसा है कि आप भी शहर में हैं और मेरे पास एक घंटे का समय है. सोचता हूं एक महफिल आपके साथ हो जाए’. उस्ताद बड़े गुलाम अली खां ऐसे तो पंडित जवाहरलाल नेहरू के दोस्त थे, लेकिन उनकी यह बात उन्हें अच्छी नहीं लगी. कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने कहा, ‘पंडित जी, आज रहने देते हैं.’ इस पर चौंककर पं.नेहरू ने पूछा, ‘क्यों आज क्या परेशानी है.’ इस पर खां साहब ने कहा, ‘ वो क्या है न पंडित जी, एक घंटे में तो सिर्फ मेरा गला गर्म होता है.’