लखनऊ: सबको इसका अंदाजा पहले से था, सिवाय सपा-बसपा गठबंधन को. यह विश्वास तब और मजबूत हुआ जब राज्यसभा सीटों के लिए वोटों की गिनती शुरू हुई ही थी कि शुक्रवार शाम बीजेपी अपने संसदीय दल की मीटिंग की तैयारियों में व्यस्त हो गई. आम राय यही है कि वोटिंग के दौरान सपा विधायकों राजा भैया और अनिल सिंह के बदले रुख के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा के नौवें उम्मीदवार अनिल अग्रवाल की जीत की शुरुआत हुई, लेकिन सच यह है कि इसकी पृष्ठभूमि उसी दिन तैयार हो गई थी जिस लोकसभा उपचुनाव के नतीजे आए थे और भाजपा को उत्तर प्रदेश की दोनों सीटों पर हार मिली थी.

सपा-बसपा गठबंधन के हाथों मिली पराजय के बाद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने इसकी शुरुआत की थी. राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ मिलकर उन्होंने ऐसी रणनीति बनाई कि सपा और बसपा के विधायक पार्टी की बैठकों और डिनर पार्टियों में तो शामिल होते रहे, लेकिन वोट करते समय बीजेपी के उम्मीदवार को वोट दे आए. उनका पोल मैनेजमेंट इतना शानदार था कि शुक्रवार सुबह वोटिंग शुरू होने तक शीर्ष भाजपा नेता, विधायकों को वोट करने के तरीके और फर्स्ट एवं सेकंड प्रिफरेंस वोट के बीच का फर्क समझा रहे थे. नतीजा यह हुआ कि संख्याबल में कमजोर होने के बाद भी बीजेपी के सभी नौ उम्मीदवार जीत हासिल करने में सफल रहे. इनमें अरुण जेटली, अनिल जैन, जीवीएल नरसिम्हा राव, विजयपाल तोमर, कांता कर्दम, अशोक वाजपेयी, हरनाथ यादव, सकलदीप राजभर और अनिल अग्रवाल शामिल हैं. सपा की जया बच्चन जीत गईं, लेकिन बसपा के भीमराव आंबेडकर इससे वंचित रह गए.

हार का बदला भी लिया
दूसरी वरीयता के वोटों के आधार पर अनिल अग्रवाल की जीत के साथ ही बीजेपी ने उपचुनावों में हार का बदला तो ले ही लिया, 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए विपक्षी पार्टियों के बीच गठबंधन की राह भी मुश्किल कर दी. दरअसल, लोकसभा के उपचुनावों में मायावती ने सपा उम्मीदवार का ‘इस हाथ ले, उस हाथ दे’ की शर्त के साथ समर्थन किया था. यानी समझौता यह था कि इसके बदले सपा राज्यसभा चुनावों में बसपा उम्मीदवार का समर्थन करेगी. सपा ने अपनी ओर से शर्त पूरी करने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन अमित शाह की रणनीति के आगे उसकी कोशिशें नाकाफी साबित हुईं.

अब क्या: विपक्षी एकता के मंसूबों पर फिरेगा पानी?
उपचुनावों में हार के बाद विपक्षी पार्टियां पूरे देश में बीजेपी के खिलाफ एकजुट होने की रणनीतियां बनाने लगी थीं. अब इसके लिए उन्हें दोबारा सोचना होगा. इन दलों को सबसे ज्यादा डर पार्टी में टूट या भीतरघात का होगा. इधर, उपचुनाव के नतीजों में बीजेपी के लचर प्रदर्शन के बाद एनडीए के सहयोगी दलों का रवैया भी बदलने लगा था. तेदेपा के अलग होने के बाद ओमप्रकाश राजभर, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार जैसे सहयोगी का अंदाज भी बदलने लगा था. ऐसी आशंका लग रही थी कि 2019 का चुनाव आते-आते एनडीए में बिखराव तेज हो सकता है. राज्यसभा चुनावों के नतीजे बीजेपी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि उसे सहयोगी दलों पर नियंत्रण रखने में कम मुश्किलें आएंगी.