नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने सोमवार को एससी/एसटी एक्‍ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी के प्रावधान को नरम करने संबंधी निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट से पुनर्विचार का अनुरोध करते हुए याचिका दायर की. सोमवार को पूरे देश में हिंसक प्रदर्शन हुए और फायरिंग में कई मौतें हो गईं. सरकार ने अपनी पुनर्विचार याचिका में कहा है कि शीर्ष कोर्ट 20 मार्च के फैसले से अनुसूचित जाति/जनजातियों के लिए संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त अधिकार का हनन होता है. सरकार ने कोर्ट से इस कानून के प्रावधानों को बहाल करने का अनुरोध किया है.

केंद्र ने पुनर्विचार याचिका में कहीं ये बातें
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर पुनर्विचार याचिका पर खुले न्यायालय में सुनवाई करने का अनुरोध किया है
– केंद्र सरकार ने पुनर्विचार याचिका में कहा- 1989 में बनाए गए इस कानून के कठोर प्रावधानों को नरम करने संबंधी 20 मार्च के फैसले के बहुत ही दूरगामी परिणाम हैं.
– यह भारत की आबादी के एक बड़े हिस्से यानी अनुसूचित जाति और जनजातियों को प्रतिकूल तरीके से प्रभावित करता है.
– यह अत्याचार निवारण कानून 1989 में परिलक्षित संसद की विधायी नीति के भी विपरीत है.
– मामले में न्यायालय की मदद के लिए मौखिक बहस आवश्यक है.
– यही नहीं यह न्याय के हित में भी होगा कि इस न्यायालय में मौखिक बहस सुनी जाए.
– अनुसूचित जाति और अनजातियों की सामाजिक आर्थिक स्थिति में सुधार के अनेक उपायों के बावजूद वे अभी भी कमजोर हैं.
– वे अनेक नागरिक अधिकारों से वंचित हैं.
– उनके साथ अनेक तरह के अपराध होते हैं और उन्हें अपमानित तथा शर्मसार किया जाता है.
– अनेक बर्बरतापूर्ण घटनाओं में उन्हें अपनी जान माल से हाथ धोना पड़ा है.
– याचिका के अनुसार अनेक ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों से उनके प्रति बहुत ही गंभीर अपराध हुए हैं
– केंद्र ने कहा है कि इस कानून की धारा 18 ही इसकी रीढ़ है, क्योंकि यही अनुसूचित जाति और जनजातियों के सदस्यों में सुरक्षा की भावना पैदा करती है
– कानून की धारा 18 में किसी प्रकार की नरमी ज्यादतियों के अपराधों से रोकथाम के मकसद को ही हिला देती है.
– यदि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपियों के अधिकारों की रक्षा की जानी है तो उसी के साथ इन समुदायों को अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षण देने की भी आवश्यकता है.
– इस कानून में किसी भी प्रकार की नरमी लाने का नतीजा अनुसूचित जाति और जनजातियों के सदस्यों को अनुच्छेद 21 में प्रदत्त उनके अधिकार से वंचित करना होगा.

एससी/एसटी के 150 कर्मचारी संगठनों ने दायर की है याचिका
कोर्ट ने अपने 20 मार्च के फैसले पर रोक लगाने और पुनर्विचार के लिए एससी/एसटी के संगठनों के अखिल भारतीय महासंघ की याचिका पर शीघ्र सुनवाई करने से इंकार कर दिया. यह करीब 150 कर्मचारी समूहों का महासंघ है. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस धनंजय वाई चंद्रचूड की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि इस याचिका पर उचित समय पर ही विचार किया जाएगा. महासंघ ने याचिका में कहा है कि इस मुद्दे को लेकर देश में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई और इसमे अनेक व्यक्तियों की जान गई हैं. अत: कोर्ट को याचिका पर शीघ्र सुनवाई करनी चाहिए.

दलित संगठनों ने शीर्ष कोर्ट के फैसले को बताया अनुचित
महासंघ की ओर से वकील मनोज गौरकेला ने कहा कि शीर्ष अदालत का 20 मार्च का फैसला अनुचित है और इस पर रोक लगाई जानी चाहिए. साथ ही उन्होंने इस याचिका पर पांच सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा विचार करने का भी अनुरोध किया. शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि कई मौकों पर निर्दोष नागिरकों को आरोपी बनाया जा रहा है और लोक सेवक अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में भयभीत हैं, यह कानून बनाने समय विधायिका की ऐसी कोई मंशा नहीं थी.

20 मार्च के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ये कही थीं अहम बातें
कोर्ट ने कहा था कि अग्रिम जमानत को इस प्रावधान से बाहर रखने को सही मामलों तक सीमित करने और ऐसे प्रकरणों में जहां पहली नजर में कोई मामला नहीं बनता है, उन्हें इसके दायरे से बाहर रखे बगैर निर्दोष व्यक्ति को कोई संरक्षण प्राप्त नहीं होगा. कोर्ट न्यायालय ने कहा था कि इस कानून के तहत गिरफ्तारी के प्रावधान के दुरूपयोग के मद्देनजर लोकसेवक की गिरफ्तारी सिर्फ उसकी नियुक्ति करने वाले प्राधिकार और गैर लोक सेवक के मामले में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की मंजूरी से ही की जा सकती है.

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च के फैसले के खिलाफ बीजेपी के सहयोगी दलों के कई सांसदों और अन्‍य दलों के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ सरकार से इस पर कदम उठाने के लिए कहा था.  (इनपुट- एजेंसी)