नई दिल्ली. आज हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, पत्रकार, कथाकार, टीवी वृत्तचित्र और धारावाहिक लेखन के पुरोधा मनोहर श्याम जोशी की पुण्यतिथि है. हिन्दी साहित्य की उनकी रचनाएं जितनी प्रसिद्ध हैं उससे कम उनके लिखे टीवी धारावाहिक भी नहीं. आप याद करें, एक तरफ आपको ‘क्याप’, ‘कसप’, ‘कुरु कुरु स्वाहा’ जैसी साहित्यिक रचनाएं याद आएंगी तो वहीं दूसरी ओर दूरदर्शन पर प्रसारित हुए धारावाहिक ‘कक्काजी कहिन’, ‘मुंगेरी लाल के हसीन सपने’, ‘बुनियाद’ और ‘हम लोग’. आप हमेशा मनोहर श्याम जोशी को अपने आसपास पाएंगे. भाषा के संबंध में जोशीजी के बारे में कहा जाता है कि उत्तराखंड में रहते हुए उन्होंने ‘कसप’ में कुमाउंनी अंदाज रखा तो ‘नेताजी कहिन’ पूरी तरह अवधी भाषा की चासनी में डूबा हुआ है. वहीं उनकी कई रचनाओं में बंबइया तड़का भी लगा है. आज जब राजनीति में नेताओं के मंदिर-मंदिर के चक्कर लगाने की खबरें मीडिया में सुर्खियां बन रही हैं, जोशीजी ने कई साल पहले ही अपने ‘नेताजी कहिन’ में ऐसी स्थितियों की तस्वीर उतार ली थी. आज उनकी पुण्यतिथि पर पढ़िए नेताजी कहिन का एक अंश.

छुट्टी का दिन था. हम अभी बिस्तर पर पड़े-पड़े चाय की चुस्कियों के साथ अखबार की सुर्खियां टूंग रहे थे कि नेताजी आ पहुंचे. आज पैंट-कुर्ता नहीं, धोती-कुर्ता पहने थे. माथे पर भभूत लगी हुई थी, हाथ में माला थी और प्रसाद का थैला. माला उन्होंने छोटे बच्चे को नेहरुआना अदा से पहनाई, थैला बड़े बच्चे को थमाया. फिर बोले, ‘आप नउकरी-पेशा लोगों के तो मजे हैं! सुबह हो गई लेकिन बिस्तर छोड़ना हराम हय. राजनीति में मिलटरी लाइफो से जियादा परेड़ हुई जाती हय ससुरी. रात एक भगत को लेकर मधप्रदेश भवन गए, दस वहीं बज गया. जफर साहब अपने रसिया जा रहे थे तड़के सीइंग-आफ के लिए दुई बजे जगार करनी पड़ी.’

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‘पालम हवाई अडडे पर कोई मंदिर खुल गया है जो तुम यह माला और प्रसाद लिए लौटे हो?’ हमने पूछा.
”अरे ये हम लाए हैं छत्तरपूर के मंदिर से. बहूत बी.आई.पी पहुंचता है वहां जबसे मय-डम हुई आई हैं. गुरुजी का हमारे बिसेस आग्रह था कि ए.पी. बाबू को पटाओ अउर हम जानते हैं कि कोई छुट्टी का दिन हो तो वह जरूरे छत्तरपूर पहुंचते हैं भोर बेला. एक भगत ने गाड़ी हमको दे ही रखी है आजकल, तो पालम से लउटकर एक झपकी ली और फिर अस्नान-ध्यान करके जा पहुंचे छत्तरपूर. अच्छा रहा, देवी अउर ए. पी. दोनों का दरसन एक साथ हो गया सुबह-सुबह. दिन अच्छा बीतेगा ससुरा. लउटते हुए सोचा चलो कक्का को भी बी.आई.पी. मंदिर का परसाद दे आवें.”
”अच्छा मन्दिर भी वी.आई.पी. और साधारण दो किस्म के होते हैं!”
”अरे यहां बी.आई.पी. जाएगा, वह बी.आई.पी. मंदिर कहलाएगा. अउर बी.आई.पी. जाएगा उसी मंदिर में जिसमें सिद्ध-उद्धि चक्कर हो. जाकर कुछ काम-वाम बनता हो भगत का. इस समय टाप पर चल रहा है अपना बिन्धवासिनी. नार्थ का सारा बी.आई.पी. वहीं जाता हय. मय-डमो गयी रही रिसेण्टली दुई बार. साउथ में तिरुपत बालाजी का जल्वा चलहि रहा हय.”

‘मंदिर काम बनवाने के लिए जाते हैं नेता लोग?”
”अरे नेता हो या जनता हो, मंदिर हो या कोई अउर जगह, बाकी किसी के कहीं जाने का सवालहि तब पइदा होता हय जब कोई काम अटका हो और उसके बनने की गुंजाइस हो. फालतू कहीं जाना अपना बखत बरबाद करना, दूसरे को बोर करना, ई सब किर्रू बिरादरी के करम हंय.”
‘मंदिर का देवता भी बोर होता है?”
”असली देवता होगा तो जरूरे बोर होगा. इतनी लंबी लाइन लगती हय भगतों की, कामकाज का मार टेंसन. एइसे में कोई दिले-नादान टाइप भगत आए अउर जब उससे पूछा जाए, भय्या, क्या चाहिता हय तू अउर दान-दच्छिना क्या लाया हय, तब वह कहे, जी मैं तो यवै मिलने चला आया था, लाया भी चउन्नी अउर चार बतासा हूं. अब बताइए इस मसखरी पर देवता भिन्नाएगा कि नहीं? यहां ससुरी एक-से-एक नेसनल-इण्टरनेसनल अउर क्या नाम कहते हैं फाइनेंसियल प्राब्लम साल्व करने में हम बिजी हैं अउर आप चले आए हाउ-डू-डू कहिने. हम देवता हैं कि आपकी मासूका!”

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”मासूका अच्छा है! हमने कहा, ‘लेकिन नेताजी, सूफियों और सिद्धों ने देवता को यही दर्जा दिया है.’
”अरे पहिले सिद्धोंवाली केटिगिरी में पहुंचिएगा तब न आपका ऊ सब नाटक जमेगा!’ नेताजी बोले, ‘अउर उस केटिगिरी में आप पहुंच गए तो आपेका देउतावाला नक्सा हुई जाएगा! एकाधा बी.आई.पी. भगत हुइ गया तो आपो बी.आई.पी. सिद्ध हुई जाओगे. एइसा कोई इरादा हो तो आपसे सच बताते हैं आजहि से हम आपका नक्शा जमाने में जुट जाएंगे. आप मनहर सुआमीजी, समझे ना, अउर हम आ आपके चीफ चेलाजी.”

नेताजी हंसे. नेताजी की हंसी सुनने से ताल्लुक रखती है. किसी कबाइली के विजयनाद में अगर आप किसी कस्बा-किशोरी की शर्मीली खिखियाहट मिला दें तो नेताजी की हंसी के आस-पास पहुंच पाएंगे.


”स्वामी भी टाप-फ्लाप होते रहते होंगे?” हमने पूछा.
”बिलकुल! नेताजी ने सूचना दी, ‘आजकल देउरहा बाबा टाप पर हैं, सदाचारी फ्लाप चल रहा है फिलहाल. एक नया तान्तरिक हमारे गुरुजी पकड़कर लाए हैं दरभंगे से. गुरुजी के लिए अनुष्ठान किया हय उसने सी.एम. से मिलवाने की बात हय. अगर वह इम्प्रेस हो गए तो पी. एमो से मिलवा देंगे. अब कउन जाने कल वही टाप हुई जाय.”
”हां, यह उसके सितारों पर निर्भर करता है.” हम मुस्कराए, ”तान्त्रिकों-ज्योतिषियों के भी तो सितारे होते होंगे.”

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”अजी हण्डरेड परसण्ट!” नेताजी ने कहा, ‘आपसे सही बताते हैं, एक जोतसी आया था उत्तरकासी से, जिसे हमारे गुरुजी ने तब एल. एन मिस्रा अउर तमाम दूसरे टाप लोगों से मिलवाया था. सिद्धि ससुरी उसकी एइसी कि न कुण्डली देखे, न हथेली बांचे, बस नब्ज पर अंगुली धरे अउर धाराप्रवाह बोलता चला जाए. टुटुके के नाम पर कभी लउंग दे दे, कभी सरसों के दाने, बस छः महीने तक बड़ा जल्वा रहा उसका. फिर जाने कइसी गरदिस में आया उसका सितारा कि जो कहे, उसका उल्टा हो, जो टुटका दे, उल्टा पड़े. एक अस्टेट मिनिस्टर को उसने बताया कि चउबीस तारीख आप केबिनेट रेंक पा जाइएगा, ससुरा चउबीस तारीख को परमात्मा की केबिनेट में जा पहुंचा.”

”आजकल आपके गुरुजी राजीव की कुण्डली बंचवा रहे होंगे?” हमने पूछा. ”मार्केट में. एक की तुला लगन है, दूसरी सिंघ अउर तीसरी की, रामजी आपको नेकी दें, कर्क. लेकिन आपसे एक बात बता दें कांफीडेंस में, इन तीनों में से कोई आथेण्टिक नहीं है, सब अटकल-पच्चू है मामला. असली कुण्डली टाप सीक्रेट हय. टाप नेता कै कुंडलियो टाप सीक्रेट होवत हय ससुर.”
”कुण्डलियां भी तो सीक्रेट होती हैं!”
”काहे नहीं?” नेताजी ने पूछा, ‘राजनीति में एक मोर्चा ससुरा तन्तर-मन्तर जज्ञ-जाज्ञ वाला भी तो हय. दुस्समन पारटी कब क्या करा दे कुछ ठिकाना नहीं.’

साभारः राजकमल प्रकाशन