नई दिल्ली: इसरो का नाम पिछले कुछ सालों से लगातार चर्चा में है. एक के बाद एक कामयाबी ने इसरो के हौसले तो बुलंद किए ही हैं, साथ ही दुनिया में भी भारत की पहचान बनाई है. इसरो ने देश के पहले सैटेलाइट आर्यभट्ट को बनाया था जिसकी लॉन्चिंग 19 अप्रैल 1975 को सोवियत यूनियन ने की थी. गणितज्ञ आर्यभट्ट के नाम पर ही इसे नाम दिया गया था. 1975 से लेकर आजतक की इसरो की कई उपलब्धियां रही हैं लेकिन आज फंड की कमी से इसरो की कई सारी परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं. इसमें 10 सेटेलाइट को लॉन्च करना और कई अन्य पीएसएलवी मिशन शामिल है.

डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस (डीओएस) के पास कॉन्ट्रैक्ट के नवीनीकरण, नए कार्यों को शुरू करने और समानों की खरीद के लिए पैसे नहीं हैं. वहीं पोलर सेटेलाइट लॉन्च के लिए भी डीओएस पैसे की कमी से जूझ रहा है. डीओएस धन जुटाने के लिए वित्त मंत्रालय की शरण में जाने की तैयारी कर रहा है. जिससे पीएसएलवी प्रोग्राम के लिए अतिरिक्त 400 करोड़ रुपए जुटा सके. इसरो के चेयरमैन के सिवन ने संसदीय कमिटी को यह जानकारी दी है. कमिटी ने हाल ही में संसद में अपनी रिपोर्ट पेश की थी.

गौरतलब है कि डीओएस ने 16,569 करोड़ रुपए की मांग की थी लेकिन 2018-19 के बजट में उसे 10,783 करोड़ रुपए ही मिले. 5786 करोड़ रुपए के फंड की कमी का असर वर्तमान में चल रहे पीएसएलवी मिशन और ब्रांच ऑफ सेटेलाइट कार्टोस-3, रिसेट-1ए जैसे कई मिशन पर पड़ सकता है. इन प्रोजेक्ट पर इसरो नाशा के साथ मिल कर काम कर रहा है.

इन परियोजनाओं में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट टेक्नोलॉजी को सरकारी कार्यों से जोड़ना भी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जिज्ञासा के कारण ही 2015 में लगभग 170 स्पेस रिलेटेड प्रोजेक्ट की पहचान की गई थी जिससे टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सरकारी कार्यों में किया जा सकता है. GSLV-Mk-III के लिए भी 800 करोड़ रुपए की मांग की गई है. HRSAT उपग्रह समूह प्रोजेक्ट भी फंड की कमी से जूझ रहा है. हालांकि इसकी उपयोगिता को देखते हुए वित्त मंत्रालय से 60 करोड़ रुपए अतिरिक्त मदद की गुहार लगाई है.