नई दिल्ली: दो टाइगरों को बचाना मंगलयान को स्पेस में भेजने से ज्यादा खर्चीला है. एक रिपोर्ट की मानें तो मंगलयान को स्पेस में भेजने में 450 करोड़ रुपए का खर्च आया. वहीं 2 टाइगरों तो बचाने में 520 करोड़ खर्च होते हैं. बाघों और मंगलयान की तुलना करना भले ही अजीब लगता हो लेकिन एक नया बायो इकोनॉमिक एनालिसिस बेहद दिलचस्प आंकड़े पेश करता है. जिसके मुताबिक, दो बाघों को बचाने से होने वाला फायदा मंगल ग्रह पर जाने की भारत की पहली कोशिश पर आने वाले खर्च की तुलना में कहीं ज्यादा है.

भारतीय आस्ट्रेलियाई वैग्यानिकों के एक दल ने अपने तरह के अनूठे विश्लेषण में एक दस्तावेज प्रकाशित किया है. इसका शीर्षक मेकिंग द हिडन विजिबल : इकोनॉमिक वैल्यूएशन आफ टाइगर रिजर्व्स इन इंडिया है और यह इकोसिस्टम सर्वसिेज जर्नल में प्रकाशित हुआ है.

इस दस्तावेज में कहा गया है कि दो बाघों को बचाने व उनकी देखभाल से होने वाला लाभ करीब 520 करोड़ रूपये है जबकि इसरो की मंगल ग्रह पर मंगलयान भेजने की तैयारी की कुल लागत लगभग 450 करोड़ रुपये है.

अंतिम अनुमान के अनुसार, भारत में वयस्क बाघों की संख्या 2,226 है जिसका मतलब है कि कुल लाभ 5.7 लाख करोड़ रुपये होगा. यह राशि सरकार द्वारा विमुद्रीकृत की गई कुल रकम के एक तिहाई के समकक्ष है. यही वजह है कि संरक्षणवादी तर्क देते हैं कि बाघों को बचाना आर्थकि नजरिये से बेहतर है.

यह स्थिति तब है जब समाज को पारिस्थितिकी संबंधी कई लाभ उन प्राकृतिक रिहायशों के संरक्षण से होते हैं जहां बाघ प्रमुख प्रजाति है, लेकिन इन लाभों को कोई आर्थकि महत्व नहीं दिया जा सकता. वह भी तब जब बाघों को बचाने से होने वाला लाभ अच्छा खासा है.

वैग्यानिकों ने छह टाइगर रिजर्व का अध्ययन किया और अनुमान लगाया कि उनका संरक्षण करना 230 अरब डालर की राशि को सुरक्षित रखने के समान है. इस राशि को वैग्यानिकों ने इन टाइगर रिजर्व के लिए स्टॉक बेनिफिट्स कहा है.