नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय की एक न्यायाधीश ने उस वाद पर सुनवाई करने से आज खुद को अलग कर लिया जिसमें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की 2016 में प्रकाशित पुस्तक से अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस से जुड़े कुछ अंश हटाने की मांग की गई है. याचिका में कहा गया है कि इसने हिंदुओं की भावनाएं आहत हुई हैं. न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह ने बिना कोई कारण बताए अपने आदेश में कहा, ‘‘कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के आदेश की दशा में इस मामले को अन्य पीठ के पास सूचीबद्ध किया जाए.’’

मुखर्जी की पुस्तक ‘टरब्यूलेंट ईयर्स 1980-1996’ के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा वकीलों के समूह ने वाद दायर किया है. वादियों की ओर से पेश हो रहे अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने संवाददाताओं से कहा, ‘‘अपराह्न तीन बजकर 15 मिनट पर न्यायाधीश ने उन्हें चैंबर में बुलाया और बिना कोई कारण बताए कहा कि वह खुद को मामले की सुनवाई से अलग कर रही हैं.’’ इस मामले पर शुरूआत में 30 जुलाई को सुनवाई होनी थी लेकिन अब इसे नौ अप्रैल को दूसरी पीठ के समक्ष रखा जाएगा.

दिन के पूर्वार्द्ध में मामले की सुनवाई करने वाली न्यायाधीश ने मुखर्जी को मौखिक रूप से नोटिस जारी किया था, लेकिन कुछ घंटे बाद ही मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने के लिये लिखित आदेश दिया. इससे पहले निचली अदालत ने तत्कालीन राष्ट्रपति की पुस्तक के कुछ खास अंश हटाने का याचिकाकर्ताओं का अनुरोध 30 नवंबर, 2016 को अस्वीकार कर दिया था. इससे बाद याचिकाकर्ताओं ने उच्च अदालत का रुख किया था. अदालत ने पिछले साल सितंबर में निचली अदालत के रिकॉर्ड तलब किए थे.

याचिकाकर्ता के वकील ने निचली अदालत के समक्ष दावा किया था कि राष्ट्रपति के खिलाफ निजी हैसियत से किए गए किसी कार्य के संबंध में उनके पद पर रहने के दौरान दीवानी वाद दायर किया जा सकता है. तत्कालीन राष्ट्रपति मुखर्जी के वकील ने निचली अदालत के समक्ष याचिका का विरोध किया था. उन्होंने कहा था कि यह विचारणीय नहीं है.