नई दिल्ली. देश के पूर्व रेल मंत्री और पश्चिम बंगाल के बैरकपुर से सांसद दिनेश त्रिवेदी को लगता है कि अगर अगले महीने कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की जीत होती है तो भारतीय जनता पार्टी में हाल में उठी विद्रोह की आवाजें सुनामी का रूप ले लेंगी. इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने आलेख में त्रिवेदी ने इसकी संभावना जताते हुए कई तर्क और देश की राजनीति में घटी कई सियासी घटनाओं के उदाहरण पेश किए हैं. उन्होंने लिखा है, ‘भारतीय राजनीति में चुनावी नतीजों को लेकर कभी अनुमान नहीं लगाना चाहिए. अगर कांग्रेस ने कर्नाटक चुनाव में जीत दर्ज की तो भाजपा में उठे विद्रोह के स्वर सुनामी का रूप ले लेंगे.’ अपने आलेख को साबित करने वाले तर्क देते हुए दिनेश त्रिवेदी ने लिखा है, ‘जो लोग 2014 में राजग में आए थे, वे किसी विचारधारा से प्रभावित होकर भाजपा के साथ नहीं आए थे, बल्कि इसके पीछे उनका उद्देश्य सांसद के रूप में अपनी सीट बचाना या केंद्रीय राजनीति में खुद को बनाए रखना था. ऐसे लोगों के लिए कोई खास राजनीतिक दल मायने नहीं रखता.’

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राजनीति में कभी पूर्वानुमान नहीं लगाना चाहिए
अपने आलेख की शुरुआत करते हुए ही दिनेश त्रिवेदी ने लिखा है, ‘सक्रिय राजनीति में तीन दशक से ज्यादा तक रहने के बाद मैंने सीखा है कि राजनीति में भविष्य को लेकर कभी पूर्वानुमान नहीं लगाना चाहिए.’ उन्होंने लिखा है, ‘1977 में किसने सोचा था कि इंदिरा गांधी जैसी नेता को राजनारायण चुनाव में हरा देंगे? जयप्रकाश नारायण के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी केंद्र में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनेगी? इसके बाद चौधरी चरण सिंह की सरकार बनने के बारे में किसने सोचा था? यह भी अनुमान नहीं लगाया गया था कि 1980 के चुनाव में इंदिरा गांधी 350 सीटों के साथ सत्ता में लौट आएंगी और जनता पार्टी को महज 31 सीटें मिलेंगी.’ त्रिवेदी ने लिखा है, ‘1989 में एक बार फिर भ्रष्टाचार को लेकर ही वी.पी. सिंह के नेतृत्व में जन-मोर्चा ने सरकार बनाई, लेकिन यह सरकार एक साल से भी कम चली. पश्चिम बंगाल में किसने सोचा था कि 2006 में बहुमत के साथ सत्ता हासिल करने वाली सीपीआई (एम) को ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पटखनी देगी. मौजूदा एनडीए सरकार भी यूपीए के भ्रष्टाचार को आधार बनाकर ही 2014 में सत्ता में आई.’

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पिछले 4 वर्षों में बदल गया जनता का मूड
दिनेश त्रिवेदी ने आलेख में कहा है कि वर्ष 2014 के चुनावों में जनता पूरे उत्साह के साथ भाजपा को सत्ता सौंपी थी. भाजपा ने जनता से मिले बहुमत के आधार पर सरकार बनाई और मजबूती के साथ कई बार जनता को और अपने कैबिनेट को बताए बिना ही कई फैसले लिए. जनता ने केंद्र सरकार के इन कार्यों को देखा है, और अब जनता का मूड अब बदल रहा है. त्रिवेदी ने लिखा है कि एक बार फिर जनता के मन में यह सवाल उठ रहा है, ‘अब कौन? विपक्ष में अब कौन ऐसा भरोसेमंद नेता है जो सरकार के खिलाफ खड़ा होगा’. उन्होंने लिखा है कि जनता के मन में उठते इन सवालों और केंद्र सरकार के प्रति नाराजगी के संकेत आपको गुजरात के विधानसभा चुनाव, राजस्थान और मध्यप्रदेश के उपचुनाव और अभी हाल में हुए उत्तर प्रदेश की दो लोकसभा सीटों के उपचुनावों में देखने को मिले हैं. बजट सत्र का आधे से ज्यादा हिस्सा बाधित रहा, यह भी सरकार के कमजोर होने का संकेत है. त्रिवेदी ने लिखा है, ‘भाजपा भले ही इसके लिए कांग्रेस के ऊपर दोष मढ़े, लेकिन इन घटनाओं ने उसकी चिंताएं जरूर बढ़ा दी हैं.’

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राजग के अंदर भी पड़ने लगी है फूट
दिनेश त्रिवेदी ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने आलेख में कहा है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में भी फूट पड़ने लगी है. उन्होंने लिखा है, ‘राजग का जहाज डूबता देख उसके सहयोगी दल तेजी से उसे छोड़ रहे हैं. पहल टीडीपी ने की, फिर शिवसेना, टीएसआर, वाईएसआर और अब अकाली दल के बयान गठबंधन से दूर होने के हैं. मुझे इस स्थिति को देखकर 1977 और 1989 के सियासी हालात की याद आ रही है. आज भाजपा के कई दलित सांसदों ने भी खुलेआम पार्टी के खिलाफ बयान दिए हैं. लोग रामविलास पासवान के ‘अगले कदम’ की ओर देख रहे हैं. यह ठीक 1977 के जैसी स्थिति है जब इंदिरा गांधी की सरकार चली गई थी.’ दिनेश त्रिवेदी ने 1989 की कांग्रेस सरकार के समय को याद करते हुए कहा है, ‘उस समय भी मीडिया में विपक्ष को बिच्छू, सांप, बेबी डॉल और लड़ते हुए मुर्गों के रूप में दिखाया गया. मेरा दिल देश के लिए धड़कता है, जैसे नारे लगते थे. यानी राजनीति का समय-चक्र फिर उसी तरह घूम रहा है.’ उन्होंने लिखा है, ‘ऐसे में मुझे फिर वही बात याद आ रही है कि राजनीति में कभी पूर्वानुमान नहीं लगाना चाहिए. पूरी दुनिया कर्नाटक के चुनावों पर नजर गड़ाए है. यह उस तोते की कहानी की तरह है जिसमें कहा गया था कि राजा की जान तोते में कैद है. अगर तोता जिंदा रहेगा तो राजा बचेगा. आज कर्नाटक उसी तोते की तरह है और राजा? हम सभी जानते हैं कि इसका फैसला अगले 15 मई को कर्नाटक में मतपेटियों के खुलने के बाद होगा.

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