नई दिल्ली. कर्नाटक में आगामी 12 मई को होने वाले विधानसभा चुनाव की गहमागहमी तेज है. प्रदेश में सत्तारूढ़ कांग्रेस और प्रमुख विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के लिए वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले यह चुनाव लिटमस टेस्ट की तरह है. राज्य में सत्ता पाने के लिए बन रहे सारे समीकरण जातीय मतों के ऊपर केंद्रित हो गए हैं. ऐसे में सौ से ज्यादा जातीय और धार्मिक मठों वाले इस राज्य में दोनों ही पार्टियां विभिन्न समुदाय को लुभाने की कोशिश में लग गई हैं. राज्य में सबसे ज्यादा वोट लिंगायत समुदाय के हैं. इसके बाद वोक्कालिंगा, कुरुब और दलित वोट हैं. प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, ‘राज्य में सौ से ज्यादा जाति आधारित मठ हैं जिनके अनुयायियों की संख्या लाखों में है. इसलिए कोई भी पार्टी जातीय वोटों को दरकिनार करके नहीं चल सकती. राज्य में जाति विभाजन की जड़ें इतनी गहरी हैं कि राजनीतिक दल और उनकी विचारधारा पर इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है.’

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लोकसभा चुनाव से पहले की सियासत
भाजपा जहां एक तरफ कर्नाटक में सत्ता वापसी के मंसूबे बांधे हुए है, वहीं दूसरी ओर लोकसभा चुनाव से पहले देश के दक्षिणी हिस्से में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रही है. भाजपा को अगर कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जीत मिलती है तो इसका संदेश पूरे देश में जाएगा और पार्टी इस जीत को इसी साल के आखिर में होने वाले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में भी भुनाएगी. इसके उलट कांग्रेस गोवा, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और उत्तर-पूर्व के राज्यों में अपनी सत्ता खोकर कर्नाटक में जीत से पार्टी में जान फूंकने का प्रयास कर रही है. यहां यह भी गौरतलब है कि राहुल गांधी के कांग्रेस के औपचारिक रूप से अध्यक्ष का पद संभालने के बाद कर्नाटक पहला बड़ा राज्य है, जहां विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. गुजरात विधानसभा चुनाव में जिस तरह से राहुल गांधी के नए ‘तेवर और कलेवर’ को देश ने देखा, उसे जारी रखने और देशभर में पीएम मोदी के खिलाफ प्रमुख चेहरा बनने के लिए भी राहुल गांधी के लिए कर्नाटक चुनाव जीतना जरूरी है. इसके अलावा यह चुनाव कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के लिए भी बड़ा ‘गेम-चेंजर’ साबित होने वाला है, क्योंकि करीब तीन दशकों के बाद लगातार 5 साल तक प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर रह कर वे कुर्सी गंवाना नहीं चाहेंगे.

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‘लिंगायत’ वोट पाने के लिए पार्टियां लगा रही दांव
राज्य में लिंगायत समुदाय सबसे बड़े वोट बैंक के रूप में काम करता है. इस समुदाय की जनसंख्या राज्य की कुल आबादी का करीब 17 प्रतिशत है. भाजपा के सीएम पद के उम्मीदवार बी.एस. येद्दीयुरप्पा भी इसी लिंगायत समुदाय से हैं. ऐसे में कांग्रेस ने भाजपा के वोट बैंक की काट ढूंढ़ने के लिए विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पहले लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देने की मांग कर डाली. कांग्रेस का यह दांव चुनाव के लिहाज से बड़ा था, क्योंकि इसके बाद राज्य में इस समुदाय के 50 से ज्यादा धर्मगुरुओं ने अप्रत्यक्ष तौर पर कांग्रेस को समर्थन दिया. हालांकि प्रत्यक्ष तौर पर बासवा धर्म पीठ की माता महादेवी को छोड़कर किसी मठ ने कांग्रेस को समर्थन देने की बात नहीं कही. माता महादेवी ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा, ‘मैं निजी तौर पर कांग्रेस का समर्थन करती हूं और अपने अनुयायियों से अपील करती हूं कि वे कांग्रेस के पक्ष में वोट दें.’ वहीं, चित्रदुर्ग मुरुगा मठ के शिवमूर्ति मुरुगा राजेंद्रस्वामी ने कहा, ‘मठ एक गैर-राजनीतिक संस्था है, इसका किसी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है. लेकिन हम उनका समर्थन करेंगे जो हमें समर्थन देते हैं.’

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8 प्रतिशत वोक्कालिंगा समुदाय भी मजबूत
वोक्कालिंगा समुदाय भी कर्नाटक में मजबूत वोट बैंक है. राज्य की कुल आबादी में इसकी संख्या 8 प्रतिशत है. इस समुदाय के बड़े नेता के तौर पर पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल (एस) के नेता एच.डी. देवेगौड़ा और राज्य के पूर्व सीएम एच.डी. कुमारस्वामी जाने जाते हैं. यह समुदाय मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से नाराज है, क्योंकि उसे लगता है कि कुरुब समुदाय से आने वाले सिद्धारमैया के सत्ता में आने के बाद वोक्कालिंगा समुदाय को किनारे कर दिया गया. इस समुदाय का मानना है कि सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री बनने के बाद कुरुब समुदाय को मजबूती प्रदान की है. इसलिए आने वाले विधानसभा चुनावों में यह समुदाय सीएम सिद्धारमैया को ‘पाठ’ पढ़ाना चाहता है. हालांकि इस समुदाय का एक वर्ग पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा और उनके बेटे कुमारस्वामी से नाराज है, फिर भी उसके सिद्धारमैया के पक्ष में जाने के प्रति कोई संभावना नहीं दिखती.

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