नई दिल्ली. आप शिवपालगंज गए हैं? गए ही होंगे! आखिर ‘राग दरबारी’ जो पढ़े वो शिवपालगंज नहीं गया हो, ऐसा कैसे हो सकता है. लेकिन अगर नहीं गए हैं तो ‘शिवपालगंज’ को उत्तर प्रदेश से उठाकर भारत का गांव बनाने वाले श्रीलाल शुक्ल की ‘राग दरबारी’ के 50 साल पूरे होने के मौके पर जा सकते हैं. जी हां, इस कालजयी उपन्यास के प्रकाशन का यह पचासवां साल है. इस मौके पर इंडिया.कॉम ने ‘राग दरबारी’ पढ़ने वाले पाठकों के अनुभव बटोरकर सजाया है पाठकों का दरबार. ऐसे पाठक जिन्होंने किशोरावस्था के दौरान यह किताब पढ़ी और आज युवावस्था को जी रहे हैं. उनके नजरिए से जानिए क्यों आज भी ‘राग दरबारी’ पढ़ना जरूरी है. पेश है ‘पाठक-दरबार’ की पहली कड़ी.

अनुराग शुक्ल
गर्मी की लंबी दुपहरिया और साहित्य पाठन में क्या संबंध है, इस पर आचार्यों को राग दरबारी की शैली में विचार करना चाहिए. हमें भी राग दरबारी ऐसी ही किसी गर्मी की दोपहर में तब हाथ लगी थी. तब चीनी कंट्रोल से मिला करती थी. सनीचर की दुकान पर भी जो चीनी मिलती थी वो परमिट से मिलती थी, ये बात सबको पता थी. लेकिन परमिट कहां से मिलता था यह किसी को नहीं पता था. यह पढ़कर जब अकेले में ठठा के हंसते तो घर वाले सोचते इसे क्या हुआ? अब अगर आज की बात करें तो बदलाव और विकास के तमाम दावों के बीच भी शिवपालगंज पूरे देश में फैल रहा है. उन मेट्रोपोलिटन शहरों में भी जिनमें बढ़ी नई पीढ़ी शिवपालगंज से अपने को भले न रिलेट कर पाए, लेकिन यहां भी राग दरबारी है. राग दरबारी का शहरी संस्करण. बाकी गांवों में राग दरबारी अपने अपडेटेड वर्जन लेकिन मूल भावना के साथ जस का तस दिखता है. मदारी के दोनों बंदर आज भी जस के तस मुंह फुला कर बैठे हैं और भरत नाट्यम की जिद कर रहे हैं.

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प्रवीण कुमार सिंह
‘राग दरबारी’ हमने 2013 में पढ़ा था. उस वक्त उसकी वन लाइनर्स में ही उलझ गया था. ये वन लाइनर्स खुद भी उलझ से जाते हैं. अब जब इसके बारे में सोचते हैं तो महसूस होता है कि यह देश ‘विलंबित ताल’ में राग दरबारी ही गा रहा है. इस लोकतंत्र में वही 60 के दशक की मक्कारी कायम है, जिसे श्रीलाल शुक्ल ने उपन्यास में उतार दिया है. उपन्यास में शिक्षा पर किया गया यह पंच एकदम सटीक है – ‘वर्तमान शिक्षा पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है जिसे कोई भी लात मार सकता है.’ अभी अभी लात पड़ी है, हम सब वाकिफ हैं. यह उपन्यास व्यंग्य के एक फंदे की तरह है. जिसमें फंसकर उपन्यास की दलदली गहराई में आया पाठक सिहर जाता है- कहीं कुछ नहीं बदलने वाला. समाज कल्याण की सरकारी योजनाओं के पैसे की ही नहीं जो कुछ भी इस दुनिया में मौजूद है, उसकी लूट ‘लोकतांत्रिक ढंग’ से चलती रहेगी. गरीब की जिंदगी हर कहीं हावी तिकड़मी, हिंसक, गिरगिट से भी तेज रंग बदलने वाले फरेबी लोगों के आगे नाक रगड़ती रहेगी. जो विरोध करेगा या तो भ्रष्ट तंत्र में खपा लिया जाएगा या मार डाला जाएगा. अगर जिंदा रहना है तो चुपचाप समर्पण कर देना चाहिए. इस उपन्यास को इसलिए हर किसी को एक बार पढ़ना चाहिए ताकि अपने आसपास जो एक ‘भ्रम’ बना है वह खत्म हो सके. श्रीलाल शुक्ल इतनी दिलेरी से जड़ता, पाखंड, मूल्यहीनता और अवसरवादी संतुलन की छटाओं का बखान करते हैं कि चिढ़कर जांचने का मन करता है कि क्या वाकई इन पचास सालों में कुछ नहीं बदला है.
अफसोस है कि व्यावहारिक राजनीति की समझ तो साफ होती है, कुछ ऊपरी बदलाव भी दिखते हैं, लेकिन अंतिम हिसाब लगाने पर निराशा ही हाथ लगती है.

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राघवेंद्र मिश्र
स्कूल-कॉलेज के कोर्स की किताबों के बीच साहित्य पढ़ना विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए कठिन होता है. शायद दूसरे बच्चों के साथ न हो, लेकिन मेरे जैसों के साथ तो था ही. यदि छात्र-युवा के घर-समाज में साहित्यिक माहौल हो तो न चाहते हुए भी वह उपन्यास, कविता, रिपोर्ताज और लेखों को सुनता है और कुछ किताबों के बारे में जान जाता है. इसी बीच साहित्य संस्कार से भरे नाम की किताब ‘राग दरबारी’ का जिक्र होता है तो उसके नाम से आकर्षण जैसी कोई चीज नहीं होती. लेकिन, इसे पढ़ने वाला इतनी बार इसके चुटीले वाक्यों, व्यंग्यों और किस्सों का जिक्र करता है कि सुनने वाला अंतत: पढ़ने का मन बना ही लेता है. पहले पन्ने के पहले पैराग्राफ से ही पाठक को अद्भुत रस मिलता है, जिसकी प्यास शब्द-दर-शब्द बढ़ती जाती है. फिर पाठक उस अवस्था में पहुंच जाता है, जहां कोई बच्चा साइकिल पर पहली बार बैलेंस बना लेता है और सूनी लड़क पर सरपट पैडल मारता रहता है. उसे लगता है कितनी दूर चले जाएं या कितना चला लें. ठीक उसी तरह पाठक को लगता है कि कितनी जल्दी अंतिम पन्ने पर पहुंचे.

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उपन्यास की ताकत इसकी व्यंग्यात्मक शैली है, जिसकी धार आपको बार-बार पढ़ने के लिए मजबूर करती है. इसमें श्रीलाल शुक्ल के व्यंग्य को समझने के लिए साहित्य का ज्ञान या भाषाई निपुणता की जरूरत नहीं होती. एक सामान्य भाषाई समझ रखने वाला व्यक्ति इसे पढ़ सकता है. जो पढ़ता है वह इसमें ऐसे तल्लीन हो जाता है जैसे शिव भांग-बूटी छान के रमी जमाए हों या कृष्ण शेषनाग के मस्तक पर बैठ बांसुरी बजा रहे हों. किताब में शिवपालगंज एक गांव है. लेकिन वह देश के हर गांव का प्रतिनिधत्व करता है. कहते हैं समय, काल और परिस्थिति के साथ चीजें बदल जाती हैं, लेकिन श्रीलाल शुक्ल ने शिवपालगंज का जैसे वर्णन किया वह आज भी देश के हर गांव के लिए वैसे ही प्रासंगिक है. शिवपालगंज को जैसे गढ़ा गया है वह उपन्यास की तरह नहीं दिखता. जैसे लगता है कि कहीं होने वाली घटना को उकेर दिया गया है. शायद उपन्यास की यही साहित्यिक श्रेष्ठता है जो बार-बार पढ़ने का मजबूर करती है और 50 साल बाद भी इसका जिक्र किया जा रहा है.

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श्रीलाल शुक्ल ने व्यंग्यों, किस्सों, घटनाओं और चुटीले वाक्यों का जैसा जिक्र किया है उससे इसके पात्रों का नाम भी अमर हो गया है. शुक्ल जी ने जिस तरह से लोकतंत्र की नर्सरियों गांव, इंटर कॉलेज, गांव की पंचायत और राजनीति के साथ-साथ कोऑपरेटिव सोसायटी का जिक्र किया है, वह कहीं न कहीं आपके साथ भी हुई घटनाओं से जोड़ता है. गांव का चरित्र हो, ग्रामीण भारत के लोगों की दिनचर्या हो या उनके रहने-खाने-बतियाने का सलीका हो, चुनाव जीतने के लिए लगाए जा रहे तीन-तिकड़म हों, अपने फायदे के लिए अपने लोगों को सेट करना हो, धांधली-भ्रष्टाचार हो. यह सब इसमें ऐसे दिखाया गया है, जैसे लगता ही नहीं कि 50 साल पहले की यथास्थिति को दर्शाते हुए कुछ लिखा गया है.

उपन्यास में शिवपालगंज एक माध्यम बना है, जिससे हम देश की अज्ञानता, भ्रष्टाचार, पाखंड, अवसरवादिता, भ्रष्टाचार, चुनाव के तिकड़म, बेवकूफी, तानाशाही, नेताओं का ओछापन, गांव की राजनीति, गांव की बैठकों का वर्णन, पंचायत की खींचतान और गांव में पुलिस-प्रशासन की स्थिति को दिखाया गया है. खास बात ये है कि इन सभी बिंदुओं पर हम आज भी जुड़ते हैं और जैसे लगता है हमारे आस-पास भी तो ऐसा ही हो रहा है. शायद इसी वजह से यह उपन्यास आज भी जीवंत है. उपन्यास का जिक्र हो और उसके कुछ चुटीले वाक्यों का जिक्र न हो तो ये अन्याय है…

– एक ट्रक खड़ा था. उस देखते ही यकीन हो जाता था कि उसका जन्म केवल सड़कों के साथ बलात्कार के लिए हुआ है.
– वर्तमान शिक्षा पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है, जिसे कोई भी लात मार सकता है.
– कहा तो घास तो खोद रहा हूं. इसी को अंग्रेजी में रिसर्च कहते हैं.
– गालियों का मौलिक महत्व आवाज की ऊंचाई में है.

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नगेन्द्र नाथ झा
मैं ग्रेजुएशन का छात्र रहा होऊंगा, जब ‘राग दरबारी’ पर नजर पड़ी थी. पहली बार पढ़ने बैठा और समूची पढ़ के ही उठा. बिहार में रहते हुए अखबारों और पत्रिकाओं में राजनीति को पढ़ना-जानना होता ही था. गांव का था, इसलिए गंवईपन किसी से सीखने की चाह भी नहीं थी. गांवों में राजनीति होती है, यह जानता था. लेकिन किसी किताब में गांव के जरिए राजनीति का ककहरा पढ़ाया गया हो, यह पहली-पहली बार इसी किताब से पढ़कर जाना था. फिर चाहे वैद्य जी हों या रंगनाथ, लंगड़ हो या सनीचर या फिर गयादीन, मैंने अपने घर में और बाहर, कई लोगों को उपन्यास के इन पात्रों का परिचय कराया. मुझे
इस उपन्यास की सबसे अच्छी बात जो लगी, वह यह थी कि इसकी हर पंक्ति में व्यंग्य है, कटाक्ष है और व्यवस्था पर चोट है. जैसे, ‘वर्तमान शिक्षा पद्धति रास्ते में पड़ी कुतिया है, जिसे कोई भी लात मार सकता है’, ‘हृदय परिवर्तन के लिए रौब की जरूरत होती है और रौब के लिए अंग्रेजी की.’ इसके अलावा पूरे उपन्यास में ऐसी कई पंक्तियां हैं जो आपको देश की परिस्थितियों के बरक्स सोचने को मजबूर करती हैं.

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