‘सैर कर दुनिया की गाफिल…’, इस शेर के साथ ही सैर-सपाटा शुरू हो, जरूरी नहीं. लेकिन सैर-सपाटे के दौरान कुछ यादगार चीजें जो आपको याद रह जाती हैं, उन्हें स्मृतियों में सहेज कर रख लेना कला से कम नहीं. इन्हीं स्मृतियों को सहेजने की श्रृंखला है, ‘सफर के साथी’. इसमें हम बात करेंगे सफर के दौरान मिलने वाले साधनों की, जैसे- बस, ट्रेन, प्लेन, रिक्शा, ठेला, पिठ्ठू या फिर ट्राम. जी हां, इस ‘भारत यात्रा’ में आज आपको बताते हैं कोलकाता के ट्राम की कुछ यादें.

ये 1999 का वर्ष था, जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की परीक्षा के लिए हमारा कलकत्ता (तब कोलकाता नहीं हुआ था) जाना हुआ. बहुत पहले राही मासूम रजा की किताब ‘आधा गांव’ में लिख गए हैं, ‘लगा झूलनी का धक्का, बलम कलकत्ता पहुंच गए’. हम इन पंक्तियों को पढ़ने से पहले कलकत्ता पहुंचे थे. हां, घर, परिवार और दुनिया-जहान में सुनते थे कलकतिया लोगों के बारे में. कोई टैक्सी चलाने वाला था तो कोई परफेसर. कोई मिल में काम करने वाला तो कोई ‘हथरिक्सा’ (हाथ रिक्शा) चलाने वाला. सो, कलकत्ता जाना अपने आप में बड़ी बात थी. ऊपर से एनएसडी का जोश. बिना रिजर्वेशन के ही, बिहार के दरभंगा से चलने वाली ‘धूलियान’ (धूड़ियान पैसेंजर ट्रेन) से चल दिए थे.

Tram1

 

पैसे निहायत ही कम लगे. कलकत्ता पहुंचने के बाद उससे भी कम पैसे में खाना मिल गया. तीन या चार रुपए में ‘माछ-भात’ (मछली-चावल). एक रिश्तेदार रहते थे, उन्हीं के यहां रुकना था. लोकल ट्रेन के स्टेशनों के नाम बाबूजी से पूछकर ही घर से चले थे, कोई दिक्कत नहीं हुई. लेकिन इससे पहले सड़क पर जो दिखा, वह अद्भुत. विलक्षण. और क्या कहें, कमाल का नजारा था. पता था कि कलकत्ते में ट्राम चलती है, लेकिन ऐसी होती है? यह पहली बार देख रहे थे. न भीड़, न स्पीड…, बस चरैवेति चरैवेति…! हमको भारत-नेपाल सीमा के ‘छुकछुकिया’ (नैरो गेज) ट्रेन की याद आ गई, जो आपको बिहार के मधुबनी के जयनगर से नेपाल के जनकपुर तक 29 किलोमीटर की यात्रा दो घंटे में कराती थी. (आजकल इस जगह पर आमान-परिवर्तन यानी नैरो गेज को ब्रॉड गेज में बदलने का काम चल रहा है. जल्द ही बड़ी लाइन की गाड़ियां इस रूट पर दौड़ने लगेंगी.)

Tram3

 

बहरहाल, उस दिन तो शाम हो गई थी. रिश्तेदार के घर पहुंचना था, सो ट्राम पर चढ़ नहीं पाए. अगले दिन पूरा समय एनएसडी के इंटरव्यू में खपाने और असफल होने का भरोसा लिए जब घर लौटने का वक्त हुआ, तब असल में मजेदार अनुभव का आगाज हुआ. जी हां, ट्राम पर चढ़ने का उसी समय तो मुहूर्त निकला था. सड़क पर तीन ही चीज नजर आ रही था. एक ट्राम, दूसरे हम, बाकी कलकत्ता. चढ़ गए भाई ट्राम में. ले लिए मजा. टन…टन…टन और बंगाली भाषा. कंडक्टर दिखा नहीं, कोई कह रहा था…एसप्लानेड. हमें जाना नहीं था, फिर भी चढ़ लिए थे. कलकत्ता को कम देखने-बूझने को वजह समझिए या फिर हिम्मत का अभाव, चार से पांच स्टॉपेज के बाद ही उतर गए थे ट्राम से. उस समय कलकत्ता में हाथ रिक्शा को बंद करने की बातें चल रही थीं. इसलिए उस पर भी चढ़ना था. लेकिन बहुत दिनों के बाद जब दोबारा कोलकाता आए, तब भी आकर्षण वैसा ही था. ट्राम भी वही थी, हमारा समय बदल गया था. हम बिना ट्राम चढ़े ही आ गए.

अब जरा कोलकाता के ट्राम के बारे में
– 24 फरवरी 1873 को पहली बार कोलकाता (तब कलकत्ता) में ट्राम चली.
– बीच में कुछ साल बंद होने के बाद इसे फिर से 1880 से चलाया गया.
– आखिरकार 1902 में पहली बार इलेक्ट्रिक ट्राम ने दौड़ना शुरू किया.
– 1922 में ट्राम बस सर्विस लॉन्च की गई.

Tram2
– 1943 में हावड़ा से कोलकाता के बीच ट्राम चलनी शुरू हुई.
– 1970 में इसे सरकार ने अधिग्रहित किया और 1978 में कलकत्ता ट्रामवेज कंपनी सरकार की हुई.
– 1982 में स्टील के बने ट्रामों का चलना शुरू हुआ.
– 2008 में पोलीकॉर्बोनेट शीट्स से बने कोच के साथ ट्राम चलने लगे.
– 2013 में एसी यानी वातानुकूलित ट्राम को सड़क पर लॉन्च किया गया.