नई दिल्ली. शंकर पुणतांबेकर अपने समय के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार रहे हैं. मराठी और हिन्दी, दोनों भाषाओं के साहित्य पर उनकी पकड़ गहरी रही है. खासकर व्यंग्य की विधा में उनका लेखन अतुलनीय माना जाता है. उनकी लघुकथाओं में भी कई बार व्यंग्य की धारा देखने को मिल जाती है. इन्हीं शंकर पुणतांबेकर की लिखी एक लघुकथा है ‘आम आदमी’. वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में इस लघुकथा को बार-बार पढ़ा जाना चाहिए.

नाव चली जा रही थी. मंझदार में नाविक ने कहा, ‘नाव में बोझ ज्यादा है, कोई एक आदमी कम हो जाए तो अच्छा, नहीं तो नाव डूब जाएगी.’

अब कम हो जाए तो कौन कम हो जाए? कई लोग तो तैरना नहीं जानते थे: जो जानते थे उनके लिए भी तैरकर पार जाना खेल नहीं था. नाव में सभी प्रकार के लोग थे – डॉक्टर, अफसर, वकील, व्यापारी, उद्योगपति, पुजारी, नेता के अलावा आम आदमी भी. डॉक्टर, वकील, व्यापारी ये सभी चाहते थे कि आम आदमी पानी में कूद जाए. वह तैरकर पार जा सकता है, हम नहीं.

उन्होंने आम आदमी से कूद जाने को कहा, तो उसने मना कर दिया. बोला, ‘मैं जब डूबने को हो जाता हूं तो आप में से कौन मेरी मदद को दौड़ता है, जो मैं आपकी बात मानूं?’ जब आम आदमी काफी मनाने के बाद भी नहीं माना, तो ये लोग नेता के पास गए, जो इन सबसे अलग एक तरफ बैठा हुआ था. इन्होंने सब-कुछ नेता को सुनाने के बाद कहा, ‘आम आदमी हमारी बात नहीं मानेगा तो हम उसे पकड़कर नदी में फेंक देंगे.’

नेता ने कहा, ‘नहीं-नहीं ऐसा करना भूल होगी. आम आदमी के साथ अन्याय होगा. मैं देखता हूं उसे. मैं भाषण देता हूं. तुम लोग भी उसके साथ सुनो.’ नेता ने जोशीला भाषण आरंभ किया, जिसमें राष्ट्र, देश, इतिहास, परंपरा की गाथा गाते हुए, देश के लिए बलि चढ़ जाने के आह्वान में हाथ ऊंचा कर कहा, ‘हम मर मिटेंगे, लेकिन अपनी नैया नहीं डूबने देंगे… नहीं डूबने देंगे… नहीं डूबने देंगे….

सुनकर आम आदमी इतना जोश में आया कि वह नदी में कूद पड़ा.

(साभारः हिन्दी समय)