नई दिल्ली. यूपी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में अपराध कम होने के तमाम दावों के बीच आजकल पूरा प्रदेश या कह लें देश, उन्नाव रेप कांड की सुर्खियों से दो-चार हो रहा है. प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के एक विधायक पर दुष्कर्म का आरोप लगा है. एक तरफ पीड़ित और उसके घरवाले, महिला संगठन न्याय की गुहार लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शासन-तंत्र पर विधायक और अन्य आरोपियों को बचाने के आरोप लग रहे हैं. अब सीएम योगी के अपराध कम होने के दावे में कितना दम है, यह तो समय बताएगा, फिलहाल आप अपराध कम होने के विषय पर लेखक सुभाष चंदर का यह व्यंग्य पढ़िए. लेखक के व्यंग्य ‘सावधान! अपराध कम हो रहे हैं’ का एक अंश पढ़कर आप सोचिए कि अपराध कैसे कम हो सकता है.

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मुख्‍यमंत्री ने विशाल आम सभा में घोषणा की कि राज्‍य से अपराध कम हो जाएंगे. प्रदेश के डीजीपी ने घोषणा सुनी. एडीजी को पास कर दी. एडीजी ने आईजी को. इस प्रकार ये घोषणा जुबान की पटरी पर चलते-चलते थाना इंचार्ज के कानों में पहुंची. थाना इंचार्ज को कानों में इन्‍फेक्‍शन का खतरा लगा. सो उसने थाने में मीटिंग बुलाई. दरोगाओं से लेकर मुंशी-सिपाहियों, दीवान जी के कानों में आदेश की सप्‍लाई हो गई कि चाहे जैसे भी हो अपराध कम करना है. अब थाना इंचार्ज निश्चिंत थे. सबने आदेश सुना, गुना और कार्रवाई शुरू हो गई. कार्रवाई का कुछ आंखों देखा-कानों सुना टाइप का विवरण यहां प्रस्‍तुत है :

थाने के अंदर एक मरगिल्‍ला सा आदमी घुसा और आते ही जोर से चिल्‍लाया: ‘हुजूर माई-बाप मेरी बच्‍ची को बचा लो, वो नीच गुंडा मेरी बच्‍ची को बरबाद कर देगा. साहब… मेरी रिपोर्ट लिख लो साब… मर जाऊंगा… बरबाद हो जाऊंगा.’
‘अबे… क्‍यों हल्‍ला कर रहा है? दूं क्‍या एक कान के नीचे… हां… बोल… कौन सा पहाड़ टूट पड़ा’ …किस बात की रिपोर्ट लिखानी है’, थाने के मुंशी ने दियासलाई की सींक से कान खुजाते हुए फर्माया.
‘हुजूर… माई बाप… मेरी 14-15 बरस की बच्‍ची को वो शेखू आए-दिन छेड़ता है. उस पर गंदी-गंदी फब्तियां कसता है. आज… तो हुजूर… उसने उसका हाथ पकड़ कर बदतमीजी भी की.’ कहते-कहते उसकी रूलाई छूट पड़ी. ‘स्‍साले… कैसा बाप है तू… तेरी बेटी से छेड़खानी होती है और तू यहां टेसुए बहा रहा है. मार स्‍साले को… हाथ पैर तोड़ दे. हम स्‍साले की रिपोर्ट भी नहीं लिखेंगे, बोल अब तो खुश.’ इस बार मुंशी जी उवाचे.

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‘साहब… क्‍या कहते हो… मैं झुग्‍गी-झोपड़ी में रहने वाला… गरीब… मरगिल्‍ला सा आदमी… कहां वो कल्‍लू कबाड़ी का सांड़… क्‍या वो मुझ से पिटेगा… मुझे तो एक धक्‍का देगा, मैं गिर जाऊंगा. साहब, हम पर दया करो, उस गुंडे को अंदर कर दो… उसे तो पुलिस ही सुधार सकती है…’ वो भूखा-नंगा फिर भिनभिनाया. ‘स्‍साले, पुलिस ने ठेका ले रखा है सबको सुधारने का… चल भाग यहां से… वरना लगाऊंगा पिछवाड़े पे डंडे… नानी याद आ जाएगी.’ मुंशी ने कहते हुए डंडा टेबिल पर ही फटकार दिया.

‘हुजूर… माई बाप… रहम करो… वो कमीना शेखू कर रहा था कि वो मेरी बेटी को उठाकर के ले जाएगा… मैं उसका कहीं ब्‍याह करूंगा तो वो उसे तेजाब फेंककर जला देगा… हुजूर… कुछ करो… वरना मैं यहीं भूखा-प्‍यासा जान दे दूंगा…’.
‘स्‍साले… तेरी मां की… पुलिस को धमकी देता है. स्‍साले, तेरी लौंडिया ही छिनाल होगी. उसके साथ इश्‍क की कबड्डी खेलती होगी, तभी तो कबाड़ी का लौंडा पीछे पड़ रहा है… जा के पहले अपनी लौंडिया को संभाल, आ गया, पुलिस को तंग करने.’

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‘हुजूर… माई बाप… मेरी बच्‍ची तो मुश्किल से 13-14 साल की है… सातवीं में पढ़ती है… वो… ये सब कैसे करेगी… हुजूर… रहम करो. उस शेखू को गिरफ्‍तार कर लो वरना वो गुंडा… कुछ कर देगा तो मैं किसी को क्‍या मुंह दिखाऊंगा…’ मरगिल्‍ला फफक-फफक कर रो पड़ा. ‘तेरी ऐसी की तैसी… स्‍साले… हम प्‍यार से समझा रहे हैं… समझ ही नहीं रहा… अबे वो गिरधारी… लगा स्‍साले के पिछवाडे पे चार डंडे… अभी अक्‍ल आ जाएगी…’ मुंशी ने डंडा एक्‍सपर्ट गिरधारी को आदेश दिया.

गिरधारी ने आदेश पर अमल शुरू कर दिया. फट… फट… फट… फट… आह मर गया… हाय रे… छोड़ दो… सिपाही जी… हाय… मर गया… जैसी कुछ आवाजें आई. भूखा-नंगा पिछवाड़ा सहलाते-सहलाते भाग गया. मुंशी ने सादे कागज पर एंट्री की – एक अपराध कम हो गया.

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