नई दिल्ली. कर्नाटक की जनता आने वाले 12 मई को विधानसभा चुनाव में राज्य में नई सरकार बनाने के लिए मतदान करेगी. इस बार का चुनाव सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के लिए जोखिम भरा है, क्योंकि इस बार उसका मुकाबला पहले से कहीं अधिक मजबूत भारतीय जनता पार्टी से है. भाजपा अभी न सिर्फ केंद्र में, बल्कि देश के 20 से ज्यादा राज्यों में सत्तासीन है या किसी अन्य पार्टी के साथ गठबंधन कर सत्ता में बनी हुई है. हालांकि राजनीतिक विश्लेषक राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के शासनकाल को कम करके नहीं आंक रहे हैं, लेकिन भाजपा का चुनावी रणनीति में महारथी होना, कांग्रेस के लिए चुनौती है. टाइम्स ऑफ इंडिया ने पिछले पांच साल के शासन के आधार पर राज्य में कांग्रेस की मजबूती और कमजोरियों का विश्लेषण किया है. आइए जानते हैं क्या हैं इसके प्वाइंट्स.

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मजबूतीः सिद्धारमैया की योजनाओं का लाभ
1. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने 2013 में शासन संभालने के बाद राज्य की जनता के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू की. इसमें अन्न भाग्य, आरोग्य भाग्य, श्री भाग्य, इंदिरा कैंटीन जैसी कई योजनाओं को जनता की खूब सराहना मिली.
2. विधानसभा चुनाव में उतरने से पहले सीएम सिद्धारमैया ने ‘कन्नड़ गौरव’ अभियान के तहत कर्नाटक प्रदेश का अलग झंडा तय करने की मांग उठाई. यह भी राज्य की जनता को लुभाने के लिए बड़ा कदम है, हालांकि विपक्षी भाजपा इसे सियासी कवायद कह रही है.
3. सीएम सिद्धारमैया ने राज्य की राजनीति में जातिगत समीकरणों को साधने के लिए भी कई कदम उठाए हैं. इसके तहत अहिन्दा ( पिछड़ा वर्ग), दलित और मुस्लिम वर्ग को साधने की कोशिश की गई है. वहीं राज्य में सबसे बड़ी संख्या में मौजूद लिंगायत समुदाय के वोट को भी कांग्रेस के पक्ष में करने की कोशिशों के तहत इस समुदाय को हिन्दू धर्म से अलग वर्ग बनाने का ‘खेल’ कांग्रेस ने खेला है.
4. कर्नाटक कांग्रेस के सिरमौर नेता होने के साथ-साथ मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पार्टी में सर्वमान्य और अविवादित नेता भी हो गए हैं. उनके पक्ष में यह बात भी जाती है कि पिछले चार दशकों में सिद्धारमैया अकेले ऐसे कांग्रेसी मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा किया है.
5. पंजाब के बाद कांग्रेस के लिए कर्नाटक ही ऐसा बड़ा राज्य बचा है जहां सत्ता बचाना पार्टी के लिए जरूरी है. इसलिए सीएम सिद्धारमैया के साथ-साथ पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी भी विधानसभा चुनाव में जीत के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं.

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कमजोरीः नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप करेंगे परेशान
1. कर्नाटक में कांग्रेस के लिए इस विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात अगर कुछ है तो वह है उसके वरिष्ठ नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप. सरकार में मंत्री डी.के. शिवकुमार पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भ्रष्टाचार के केस दर्ज कर रखे हैं. वहीं बेंगलुरू में विधायक एन.ए. हरीश के बेटे की गैरकानूनी हरकतें भी सुर्खियां बनी हैं.
2. सरकार और संगठन के बीच समन्वय का अभाव, जो कांग्रेस की परंपरागत कमजोरी रही है, कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भी पार्टी को परेशान कर सकता है. क्योंकि कहा जा रहा है कि सरकार की कई कल्याणकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार में संगठन के स्तर पर नेताओं ने दिलचस्पी नहीं दिखाई.
3. सीएम सिद्धारमैया पार्टी में सर्वमान्य नेता हैं. लेकिन पार्टी के भीतर ही कई ऐसे धड़े भी बन गए हैं जो सीएम के लिए चुनाव में कठिनाई खड़ी कर सकते हैं. इससे पार्टी की एकजुटता का संदेश भंग होने की आशंका है.
4. राज्य में अहिन्दा (पिछड़ा वर्ग) को साधने की सीएम सिद्धारमैया की कोशिशों को भाजपा सियासी खेल बताती रही है. यह मुद्दा भी चुनाव में कांग्रेस के लिए चुनौतीपूर्ण होगा.
5. पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा कर्नाटक में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी जनता दल (एस) के नेता हैं. उनकी पार्टी के साथ कांग्रेस का चुनावी तालमेल कैसा होगा, यह भी चुनाव में महत्वपूर्ण है.

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