नई दिल्लीः अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवावरण अधिनियम (एससी/एसटी एक्ट) को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के विरोध में दलित और आदिवासी संगठनों ने भारत बंद रखा. पूरे देश में हिंसा और आगजनी की घटनाएं सामने आ रही हैं. मध्य प्रदेश में हिंसा के दौरान 4 लोगों के मारे जाने की खबर है. इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने एससी/ एसटी अधिनियम में संरक्षण के उपायों के फैसले पर रोक लगाने और इस पर पुनर्विचार की एक याचिका पर तत्काल सुनवाई से इंकार कर दिया.करीब 150 समूहों से मिलकर बने एससी/ एसटी संगठनों के अखिल भारतीय संघ ने बड़े पैमाने पर हुई हिंसा का संदर्भ देते हुए अविलंब सुनवाई की मांग की. एससी/ एसटी संगठनों द्वारा अविलंब सुनवाई की मांग अस्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले पर सुनवाई उचित समय पर होगी.

केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में एक पुनर्विचार याचिका दायर कर एससी-एसटी के कथित उत्पीड़न को लेकर तुरंत होने वाली गिरफ्तारी और मामले दर्ज किए जाने को प्रतिबंधित करने के शीर्ष न्यायालय के आदेश को चुनौती दी. सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका में कहा गया है कि शीर्ष न्यायालय का आदेश अनुसूचित जाति (एसी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 के प्रावधानों को कमजोर करेगा.

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मंत्रालय ने यह भी कहा कि हालिया आदेश से कानून का डर कम होगा और इस कानून का उल्लंघन बढ़ सकता है. शीर्ष न्यायालय ने इस कानून के तहत तुरंत होने वाली गिरफ्तारी और आपराधिक मामले दर्ज किए जाने को हाल ही में प्रतिबंधित कर दिया था.

केंद्र सरकार ने कहा कि SC/ST एक्ट पर जिस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया हैं उसमें सरकार पार्टी नहीं थी, जबकि संसद ने कानून बनाया था. केंद्र ने कहा कि कानून बनाना संसद का काम है. सरकार का मानना हैं कि 3 तथ्यों के आधार पर ही सुप्रीम कोर्ट कानून को रद्द कर सकता है. अगर मौलिक अधिकार का हनन हो, कानून गलत बनाया गया हो या कोई कानून बनाने का अधिकार संसद के अधिकार क्षेत्र में आता नहीं हो.

सरकार की ये भी दलील है कि कोर्ट ये नहीं कह सकता है कि कानून का स्वरूप कैसा हो क्योंकि कानून बनाने का काम संसद का है. साथ ही किसी भी कानून को सख्त बनाने का अधिकार भी संसद के पास ही है. वहीं केंद्र ने ये भी कहा कि समसामयिक जरूरतों की की पूर्ति के लिए कैसा कानून बने ये संसद या विधानसभा तय करती है.

लोजपा प्रमुख राम विलास पासवान और केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री थावरचंद गहलोत के नेतृत्व में राजग के एसएसी और एसटी सांसदों ने इस कानून के प्रावधानों को कमजोर किए जाने के शीर्ष न्यायालय के फैसले पर चर्चा के लिए पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की थी. गहलोत ने उच्चतम न्यायालय के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका के लिये हाल ही में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को एक पत्र लिखा था.

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उन्होंने इस बात का जिक्र किया था कि यह आदेश इस कानून को निष्प्रभावी बना देगा और दलितों एवं आदिवासियों को न्याय मिलने को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करेगा. वहीं राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने फैसले पर पुनर्विचार की मांग करते हुए कहा कि मूल अधिनियम को बहाल किया जाना चाहिए.