सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर के मामले में बड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने दोनों पक्षों से आपस में मामला सुलझाने को कहा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि कोर्ट के बाहर मसला नहीं सुलझा पाए तो जज मध्यस्थता करने को तैयार हैं। कोर्ट ने कहा कि ये धर्म और आस्था का मामला है। कोर्ट ने 31 मार्च को अगली सुनवाई की तारीख तय की है।

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मंदिर विवाद को संवेदनशील और भावनात्मक मामला  बताते हुए मंगलवार को कहा कि इस विवाद का हल तलाश करने के लिए सभी संबंधित पक्षों को नए सिरे से प्रयास करने चाहिए। प्रधान न्यायाधीश जे एस खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि ऐसे धार्मिक मुद्दों को बातचीत से सुलझाया जा सकता है और उन्होंने सर्वसम्मति पर पहुंचने के लिए मध्यस्थता करने की पेशकश भी की।

पीठ में न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एस के कौल भी शामिल हैं। पीठ ने कहा कि ये धर्म और भावनाओं से जुड़े मुद्दे हैं। ये ऐसे मुद्दे हैं जहां विवाद को खत्म करने के लिए सभी पक्षों को एक साथ बैठना चाहिए और सर्वसम्मति से कोई निर्णय लेना चाहिए। आप सभी साथ बैठ सकते हैं और सौहार्द्रपूर्ण बैठक कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की जब बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस मामले पर तत्काल सुनवाई की मांग की।

स्वामी ने कहा कि इस मामले को छह साल से भी ज्यादा समय हो गया है और इस पर जल्द से जल्द सुनवाई किए जाने की जररत है। सांसद ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय के सदस्यों से बात की थी और उन्होंने कहा था कि इस मामले को हल करने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की जरुरत है।

चीफ जस्टिस ने कहा कि सर्वसम्मति से किसी समाधान पर पहुंचने के लिए आप नए सिरे से प्रयास कर सकते हैं। अगर जरुरत पड़ी तो आपको इस विवाद को खत्म करने के लिए कोई मध्यस्थ भी चुनना चाहिए। अगर दोनों पक्ष चाहते हैं कि मैं उनके द्वारा चुने गए मध्यस्थों के साथ बैठूं तो मैं इसके लिए तैयार हूं। यहां तक कि इस उद्देश्य के लिए मेरे साथी न्यायाधीशों की सेवाएं भी ली जा सकती हैं।

चीफ जस्टिस जे एस खेहर ने कहा कि अगर संबंधित पक्ष उनकी मध्यस्थता चाहते हैं तो वह इस काम के लिए तैयार हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर दोनों पक्ष चाहे तो वह प्रधान वार्ताकार भी नियुक्त कर सकता है। इसके बाद पीठ ने स्वामी से कहा कि वे दोनों पक्षों से सलाह करें और 31 मार्च तक फैसले के बारे में सूचित करें।

पिछले साल 26 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने ध्वस्त किए गए विवादित ढांचे के स्थल पर राम मंदिर के निर्माण की मांग करने वाली स्वामी की याचिका के साथ उन्हें अयोध्या विवाद से संबंधित लंबित मामलों में बीच बचाव करने की अनुमति दी थी।

इससे पहले बीजेपी नेता ने अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण की अनुमति देने का निर्देश देने के लिए एक याचिका दायर की थी और तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश टी एस ठाकुर की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष उस पर तत्काल सुनवाई करने का अनुरोध किया था।

अपनी याचिका में स्वामी ने दावा किया था कि इस्लामी देशों में प्रचलित प्रथाओं के तहत किसी मस्जिद को सार्वजनिक उद्देश्यों जैसे कि सड़क निर्माण के लिए किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित किया जा सकता है जबकि किसी मंदिर का निर्माण होने के बाद उसे हाथ नहीं लगाया जा सकता।

उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं के निस्तारण में तेजी लाने के निर्देश देने की भी मांग की थी जिसमें 30 सितंबर 2010 को अयोध्या में विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल को तीन तरीके से विभाजित करने का फैसला दिया था।

सुब्रमण्यम स्वामी: फोटो- Gettyimages
सुब्रमण्यम स्वामी: फोटो- Gettyimages

वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी ने कोर्ट का प्रस्ताव ठुकरा दिया है। जफरयाब जिलानी ने कहा कि कोर्ट के बाहर मामला नहीं सुलझ सकता। कोर्ट मध्यस्थता अगर करे भी तो वह कानूनी होगा। उधर, आरएसएस ने कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। संघ नेता दत्तात्रेय होसबोले ने कहा कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनना चाहिए जिसमें हर भारतीय की भागीदारी हो। मध्यस्थता के सवाल पर उन्होंने कहा  कि इस पर धर्म संसद और दूसरे पक्षों को फैसला करना है जो इसमें पार्टी हैं।

ऐतिहासिक है विवाद 

ऐसी मान्यता है कि अयोध्या में राम मंदिर की जगह पर 1528 में मस्जिद का निर्माण हुआ था। साल 1850 में पहली बार मंदिर को लेकर सांप्रदायिक दंगा फैला और उसके बाद ब्रिटिश सरकार ने बढ़ते विवाद के बाद 1859 में विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी। इस दौरान मुस्लिम अंदर और हिंदू बाहरी हिस्से में पूजा-पाठ किया करते थे। लेकिन मंदिर की मांग को लेकर 1946 में हिंदू महासभा ने इस पर आंदोलन शुरू किया और 22 दिसंबर 1949 में वहां राम की मूर्ति स्थापित हुई। इस विवाद में भारतीय जनता पार्टी की इंट्री 1980 में हुई और फिर बीजेपी ने राम मंदिर आंदोलन का मोर्चा संभाल लिया। 1990 में एल के आडवाणी ने राम मंदिर के लिए रथयात्रा शुरू की है और 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने विवादास्पद ढांचे को गिरा दिया।

राम मंदिर पर कोर्ट का फैसला

राम मंदिर का विवाद जब कोर्ट पहुंचा तब इस मामले पर 13 मार्च, 2002 को सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने को कहा और शिलापूजन की इजाजत देने से इनकार कर दिया। वहीं इस विवाद पर साल 2009 को लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट संसद में पेश की गई लेकिन इस विवाद में 30 सितंबर 2010 को एक नया मोड़ आया जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा जिसमें एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े को देने का प्रस्ताव रखा। लेकिन 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।

(पीटीआई इनपुट)