नई दिल्लीः यूजीसी ने (प्रमोशन ऑफ एकेडमिक इंटीग्रिटी एंड प्रिवेंशन ऑफ प्लेजरिज्म इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन) रेग्युलेशन्स 2018 को 20 मार्च को हुई मीटिंग में मंजूरी दे दी. अगर मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से इसे अप्रूवल मिलता है तो साहित्य चोरी करने वाले रिसर्चर का रजिस्ट्रेशन रद्द हो सकता है, वहीं टीचर्स की भी जॉब जा सकती है. इस कानून में साहित्य चोरी करने वालों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है.

ड्राफ्ट के अनुसार अगर 10 प्रतिशत साहित्य चोरी का मामला सामने आता है तो कोई पेनाल्टी नहीं लगेगी. वहीं 10 से 40 प्रतिशत से ज्यादा के समानता के स्तर पर रिसर्चर्स को अपने कार्य में संशोधन करने का मौका मिलेगा. छात्र को 6 महीने में रिवाइज्ड रिसर्च पेपर जमा करना होगा.

अगर किसी मामले में समानता का स्तर 40 से 60 प्रतिशत होता है तो स्टूडेंट को एक साल तक पेपर सबमिट करने से रोक दिया जाएगा. वहीं अगर समानता का स्तर 60 प्रतिशत से ज्यादा होगा तो स्टूडेंट का उस प्रोग्राम के लिए रजिस्ट्रेशन कैंसल कर दिया जाएगा.

वहीं टीचर्स के मामले में शैक्षणिक और शोध पेपर की समानता 10 से 40 प्रतिशत के बीच पाई जाती है तो उन्हें अन्य पेपर से अलग होने के लिए कहा जाएगा. अगर समानता का स्तर 40 से 60 प्रतिशत के बीच पाई जाती है तो ऐसे में उन्हें नए मास्टर्स, एमफील, और पीएचडी स्टूडेंट्स को सूपरवाइज करने का अगले दो साल तक मौका नहीं मिलेगा. इसके साथ ही उनके एक साल का इंक्रीमेंट भी रोक लिया जाएगा. अगर साहित्यिक चोरी का मामला 60 से ज्यादा है तो ऐसे में टीचर को निलंबित या बर्खास्त किया जा सकता है.

यूजीसी ने सितंबर 2017 में साहित्य चोरी को लेकर एक कमिटी का गठन किया था. भारत में सेंट्रल यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर्स और टीचर्स के खिलाफ पिछले कुछ सालों में साहित्य चोरी के कई मामले सामने आए हैं. 2016 में पॉन्डिचेरी यूनिवर्सिटी की वीसी चंद्रा कृष्णमूर्ति ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. उन पर आरोप लगा था कि कृष्‍णमूर्ति ने अपनी सीवी में दी गई एक किताब के अधिकांश हिस्सों को चोरी किया है. सीवी में दो ऐसी किताबों का भी जिक्र है, जो कभी छपी ही नहीं. वहीं कुमाऊं यूनिवर्सिटी के वीसी रहे बीएस राजपूत का भी मामला खूब उछला था. उन पर साहित्य चोरी के कई सारे आरोप लगे थे.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर दिनेश सिंह के अनुसार भारतीय विश्वविद्यालों में साहित्य चोरी का मामला गंभीर मुद्दा है. यही कारण है कि सरकार को कानून बनाना पड़ रहा है. हालांकि अच्छा होता कि यूनिवर्सिटी के पास आंतरिक प्रकिया होती जैसा कि दुनियाभर के अन्य विश्वविद्यालयों में देखने को मिलता है.