नई दिल्ली: कृष्ण पक्ष के 13वेें दिन (त्रयोदशी) को प्रदाेेष व्रत मनाया जाता है.  इस दिन भगवान शिव की पूजा की जाती है. ऐसी मान्यता हैै कि यह व्रत सबसे शुभ और सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में है. प्रदोष व्रत अगर शनिवार को आता है तो यह संतान प्राप्ति की कामना पूरी करता है. शनिवार का व्रत ऐसे जातकों को करना चाहिए, जो संतान प्राप्त करना चाहते हैं.  इस बार प्रदोष व्रत शनिवार 14 अप्रैल को ही है. इस बार प्रदोष व्रत पर विशेष संयोग बन रहा है. क्योंकि शनिवार 14 अप्रैल को मासिक शिवरात्रि और मेष संक्रांति भी है.  मेष संक्रांति के दिन सूूूूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं और नये वर्ष का प्रारंभ होता है. लिहाजा 14 अप्रैल का दिन बेहद शुभ और पुण्य देने वाला है.

महिमा और महत्व 

ऐसा माना जाता है कि प्रदोष व्रत करने वाले जातकों को गाय दान करने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है. कलयुग में जब धरती पर पापियों की संख्या बढ़ जाएगी, तब प्रदोष व्रत रखने वाले और शिव की पूजा करने वाले लोगों पर भगवान शंकर की विशेष कृपा होगी. वह जन्म- जन्मान्तर के फेरों से निकल कर मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ेगा. उसे स्वर्ग लोक की प्राप्ति होगी.

दिन के अनुसार अलग है प्रदोष व्रत का महत्व

प्रदोष व्रत का महत्व दिन के अनुसार बदल जाता है. शनिवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत संतान प्राप्ति की कामना को पूरी करता है.  संतान सुख प्राप्त करने के इच्छुक लोगों को शनिवार के दिन आने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए.

रविवार : प्रदोष व्रत यदि रविवार को है तो इसे करने से आयु वृद्धि होती है और स्वास्थ्य लाभ मिलता है. किसी जातक की यदि सेहत हमेशा खराब रहती है तो उसे रविवार को आने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए.

सोमवार : यह दिन भगवान शंकर को समर्पित है और त्रयोदशी का व्रत भी भोलेनाथ के लिए ही किया जाता है. इसलिए सोमवार को आने वाला त्रयोदशी व्रत जिसे प्रदोष व्रत कहतेे हैं, सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है.

मंगलवार: जो लोग ज्यादातर बीमार रहते हैं उन्हें मंगलवार को आने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए. इसे करने से सभी रोगों से छुुुुटकारा प्राप्त होता है.

बुधवार: इस दिन आने वाले प्रदोष व्रत करने वाले जातक को की सभी कामनाओं पूर्ण होती हैं.

गुरुवार: इस दिन प्रदोष व्रत पड़े तो शत्रुओं का विनाश होता है.

शुक्रवार: यह प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति देता है.

व्रत विधि

सूर्य उदय से पहले उठें और स्नान कर लें. इसके बाद पूजा घर में भगवान शंकर के सामने आसन लगाकर बैठे और व्रत का संकल्प लें. इस व्रत में भोजन नहींं करते. इसलिए शाम तक आप कुछ नहीं खा सकते. शाम को सूर्यास्त से एक घंटे पहले स्नान करें और श्वेत और साफ वस्त्र पहनें. इसके बाद पूजा घर की साफ-सफाई करें और गंगाजल का छिड़काव कर पूरे घर को शुद्ध करें.

अगर पूजा घर मिट्टी का कमरा है तो उसे पहले गाय के गोबर से लीप लें. मंडप तैयार करें और उसमें पांच रंगों से रंगोली बनाएं. प्रदोष व्रत कि आराधना करने के लिए कुशा के आसन का प्रयोग किया जाता है. इस प्रकार पूजन की तैयारियां करके उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे और भगवान शंकर का पूजन करना चाहिए. पूजन में भगवान शिव के मंत्र ‘ऊँ नम: शिवाय’ का जाप करते हुए शिव को जल चढ़ाना चाहिए.

कैसे करें उद्यापन
इस व्रत का संकल्प उठाया जाता है इसलिए इसका उद्यापन करना चाहिए. एक बार त्रयोदशी व्रत उठाने के बाद 26 त्रयोदशी व्रत करना चाहिए और उसके बाद उसका उद्यापन करना चाहिए. व्रत का उद्यापन त्रयोदशी तिथि पर ही करना चाहिए.

त्रयोदशी व्रत के उद्यापन से एक दिन पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है. उद्यापन से पहलेे रात को कीर्तन और जागरण करना चाहिए. सुबह जल्दी उठकर मंडप बनाकर, मंडप को वस्त्रों और रंगोली से सजाकर तैयार किया जाता है.’ऊँ उमा सहित शिवाय नम:’ मंत्र का एक माला यानी 108 बार जाप करते हुए हवन किया जाता है. हवन में आहूति के लिए खीर का प्रयोग किया जाता है. हवन समाप्त होने के बाद भगवान भोलेनाथ की आरती की जाती है और शान्ति पाठ किया जाता है. अंत: में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है और अपने सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है.