कोच्चि: एक अध्ययन की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि यदि समय रहते प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक नहीं लगाया गया तो साल 2050 तक समुद्र में मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक का कचरा पाया जाएगा.

समुद्र में जमा हो रहे प्लास्टिक के कचरे पर आयोजित दो दिन के राष्ट्रीय सेमीनार में मौजूद सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (CMFRI) की मुख्य वैज्ञानिक डॉ. वी कृपा ने बताया कि आज जिस तरह के हालात हैं, उसके लिहाज से साल 2050 तक समुद्र में 850 मिलियन मेट्रिक टन प्लास्टिक कचरा जमा हो जाएगा. जबकि उस समय मछलियों की संख्या सिर्फ 821 मिलियन मेट्रिक टन ही बची रहेगी. यानी आने वाले समय में समुद्र में मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक का कचरा होगा.

उन्होंने कहा कि हर साल समुद्र में तेजी से प्लास्टिक कचरा का स्तर बढ़ रहा है और यह इसी तरह जारी रहा तो यह समुद्री जीवों के लिए खतरा पैदा कर सकती है. खासतौर से मछलियों के लिए यह सबसे बड़ा संकट है.

डॉ. कृपा ने कहा कि समुद्र प्रदूषण को चेक करने और उसे नियंत्रित करने की आवश्यकता है. हाल के अध्ययनों से पता चला है कि समुद्र में प्लास्टिक मलबे के 5.25 खरब टुकड़े हैं. इसमें से 2,69,000 टन सतह पर तैरता है, जबकि चार अरब सूक्ष्म फाइबर प्रति वर्ग किमी गहरे समुद्र में डूबे रहते हैं.

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उन्होंने कहा कि सूक्ष्म-प्लास्टिक समुद्री खाद्य श्रृंखला के लिए एक गंभीर खतरा है. भारतीय उपमहाद्वीप के समुद्र में जैसे-जैसे प्लास्टिक मलबे का स्तर बढ़ रहा है, उसका असर मछलियों के साथ-साथ समुद्री पक्षियों पर देखने को मिल रहा है. समुद्री मछली जैसे कि सार्डिन से लेकर ट्यूना तक कई किस्म की मछलियों और समुद्री पक्षियों में प्लास्टिक के स्तर में वृद्धि पाया गया है.

प्लास्टिक मैन ऑफ इंडिया के नाम से मशहूर डॉ. वसुदेव राजागोपलन भी इस सेमीनार में मौजूद थे. उन्होंने कहा कि समस्या सिर्फ प्लास्टिक ही नहीं है. बल्कि लोगों की आदतें हैं.

प्लास्टिक और टार से सड़क का निर्माण करने वाले डॉ. वसुदेव ने कहा कि प्लास्टिक का इस्तेमाल अच्छी चीजों के लिए किया जा सकता है. विकास में इसका भरपूर उपयोग होना चाहिए. लेकिन प्लास्टिक का लापरवाह निपटान ऐसी समस्याएं पैदा कर रहा है जो भूमि और सागर दोनों में संसाधनों के क्षरण को बढ़ावा दे रहा है.

यदि व्यवस्थित और वैज्ञानिक रूप से इसका इस्तेमाल किया जाए, तो प्लास्टिक को एक अच्छा ऊर्जा-बचत संसाधन बनाया जा सकता है. अगर देश के सभी सड़कों का निर्माण प्लास्टिक से शुरू कर दें तो भारत को प्लास्टिक बाहर के देशों से आयात करना पड़ेगा. टार के साथ प्लास्टिक को मिक्स करना कोई बड़ी चीज नहीं है. यह बेहद आसान है.  इस तरह प्लास्टिक का इस्तेमाल भी हो जाएगा और हमारा समुद्री जल जीवन भी प्रभावित नहीं होगा.