भोपाल गैस त्रासदी देश के इतिहास पर सबसे बड़ा दाग है जिसकी वजह से आज भी भोपाल की हवा में जहर का अनुभव होता है। भेपाल गैस त्रासदी के 32 साल बीत जाने के बाद भी जख्म अभी ताजे हैं। जब भी इस घटना की बरसी आती है तो इस दुर्घटना में बचने वाले और प्रभावित होने वाले हजारों लोग  अपनों को याद कर दुखी हो जाते हैं। इस त्रासदी ने न जाने कितनों को अपनों से दूर कर दिया।

2-3 दिसंबर 1984 की मध्‍यरात्री को यूनियन कार्बाइड कारखाने प्‍लांट सी का टैंक नंबर 610 अचानक फट गया और इसी के साथ भोपाल की सांसो में 42 टन मिथाइल आइसोसाईंनेट रिसकर फैल गया। उस रात हवा का रूख भी गरीबों की ही तरफ था, जिनके पास अपना तन ढकनें के लिए पूरे कपड़े तक नहीं थे। वो भला इस अदृश्‍य मौत से खुद को कैसे बचा पाते। आधी रात में मिथाइल आइसोनेट के रिसाव के कारण सरकारी आंकड़ों के अनुसार मरने वालों की संख्या लगभग तीन हजार थी जबकि मरने वालों की वास्तविक संख्या लगभग 20 हजार के पार थी।

जैसा कि पता चला कि, कारखाना के कई सुरक्षा उपकरण न तो ठीक हालात में थे और न ही सुरक्षा के अन्य मानकों का पालन किया गया था। पाइप की सफाई करने वाले हवा के वेन्ट ने भी काम करना बन्द कर दिया था। तापमान बताने वाला मीटर भी उस दिन काम करना बंद कर दिया था। टैंक में पानी पहुंचने की वजह से तापमान 200 डिग्री तक पहुंच गया और धमाके के साथ टैंक का सेफ्टी वाल्व उड़ गया और टैंक से मौत रिसने लगी।
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कारखाने में विस्‍फोट होने के बाद संयोग इतना बुरा था जैसे मौत ने पूरी दुनिया को किनारे कर उस रात भोपाल को ही चुना था। कारखाने में लगा आपातकालिन अलार्म भी उस दिन खराब हो गया था, जो कि नींद में सो रही निर्दोष जनता को जगा भी नहीं सकी, और वह जहरीली गैस ने बड़े ही आराम से बूढ़े, जवानों सहित हजारो बच्‍चों की सांसो में मौत भर दी।

भोपाल के एक स्थानीय दैनिक में पत्रकार राजकुमार केसवानी ने यूनियन कार्बाइड में खौलते जहर की तमाम खबरें दीं। मगर इन खबरों पर गहराई से सोचने वाला कोई नहीं था। बेखबर सरकार चैन की नींद सोती रही। राजकुमार केसवानी लगातार खबरें लिखते रहे। उन्होंने राष्ट्रीय अखबारों में भी कार्बाइड के कारनामे का खुलासा किया मगर भोपाल में बैठी सरकार ही कंपनी की निगहबान बनी बैठी थीं।

एक पत्रकार को अपनी लिखी खबर के सच होने का गुरूर होता है मगर राजकुमार केसवानी को गहरा अफसोस है। उन्होंने आखिरी खबर 8 अक्टूबर 1984 को बेहद गुस्से में लिखी थी। हेडिंग थी-अब भी सुधर जाओ वर्ना मिट जाओगे। एक सतर्क और जिम्मेदार पत्रकार की चेतावनी को नजर अंदाज करने का नतीजा पूरा भोपाल भुगत रहा था।
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3 दिसंबर की सुबह सूरज चढ़ता गया और चढ़ते सूरज के साथ भोपाल के आसमान में चील और गिद्ध मंडराने लगे। इनका मंडराना ही गवाही दे रहा था कि भोपाल की सड़कों पर कितनी लाशें बिछी हैं। इन लाशों में लोग तो थे ही, बड़ी तादाद में बेजुबान जानवर और मवेशी भी थे लेकिन जब इंसानों की लाशें उठाने वाला ही कोई नहीं था तो जानवरों की फिक्र कौन करता।

भोपाल के कलेक्टर रहे मोती सिंह शहर और सड़कों के जो हालात बयान करते हैं वो दोजख से भी बुरा है। इंसान ही इंसानी लाशों को जानवरों की तरह उठा रहे थे। गाड़ियों में भर रहे थे। हर तरफ लाशों से उठ रही बदबू भरी थी। लेकिन वहां तो जिंदा इंसान भी लाशों में तब्दील हो गया था। जो बच गए थे उनके सारे अहसास ही जैसे मर गए थे।

भोपाल में हज़ारों लोगों की मौत के बाद अमेरिका भाग जाने वाले वारेन एंडरसन को क्या कभी वे लोग याद आते होंगे जो उसकी कंपनी की लापरवाही से रिसी गैस की वजह से मारे गए? वह दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क का नागरिक था। मुनाफ़ा कमाने हिंदुस्तान आया था। उसका काम यहां के नागरिकों की सुरक्षा करना नहीं था। उसका काम अपनी कंपनी को कम से कम खर्च पर चलाना था। उसी कंपनी को जो अमेरिका के लिए मानक अलग रखती थी और हिंदुस्तान के लिए अलग।
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दरअसल एंडरसन और यूनियन कार्बाइड की हरक़त को क़रीब से देखेंगे तो समझेंगे कि ये बस सीईओ और उसकी कंपनी का मामला नहीं है। अविकसित और विकासशील देशों को अपनी चरागाह समझने वाली मगरूर कंपनियों का भी है।

32 वर्षों बाद आज भी विदेशी कंपनियों को न्योता देते हुए हम उनके आगे और भी झुकने को तैयार हैं। अपने नागरिकों के हितों को उनकी सुरक्षा को उनकी सुविधाओं को और उनके सम्मान को भी कुर्बान करते दिखाई पड़ते हैं।

एक ताकतवर मुल्क होने की चाहत अच्छी है, लेकिन समझने की बात ये है कि ये काम मुनाफ़ाखोर पूंजीवाद की सरपरस्ती में नहीं हो सकता। उसके लिए वह राष्ट्रीय स्वाभिमान चाहिए, जिसमें कम में काम चलाने और सबकुछ साझा करने का अभ्यास भी हो। वरना भोपाल जैसे हमारी स्मृति में ही नहीं हमारे अंदेशों में भी बने रहेंगे और जब कभी घटित होंगे तो हमारे पास कुछ कहने को नहीं होगा।