नई दिल्ली. संगीत की कोई भाषा नहीं होती. इसमें सिर्फ भाव होते हैं. संवेदनाएं होती हैं. इसलिए पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रही इस महिला की कविता के वीडियो को लोग शेयर कर रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि यह महिला बांग्ला भाषा में कविता पाठ कर रही है. लेकिन इतने अनोखे तरीके से वह कविता को गा रही हैं कि बंगाली भाषा नहीं जानने वाले लोग भी वीडियो को सुनकर उसे शेयर कर रहे हैं. इस वीडियो में कविता पाठ कर रहीं यह महिला बृतति बंद्योपाध्याय हैं. बृतति पश्चिम बंगाल में साहित्य की दुनिया में जानी-पहचानी शख्सियत हैं. वह न सिर्फ कविता पाठ करती हैं, बल्कि एक उच्चारण विद भी हैं. लोगों को प्रभावशाली तरीके से बोलना और उच्चारण करना सिखाती हैं. आप भी देखें उनका यह वीडियो.

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कविता में क्या कह रही हैं बृतति बंद्योपाध्याय
वायरल हो रहे इस वीडियो में बृतति बंद्योपाध्याय बचपन के दिनों की याद कर रही हैं. वे बता रही हैं कि बचपन में जब छुट्टियों के दिन आते थे तो बच्चे माता-पिता से कहां जाने की जिद करते थे. इंडिया.कॉम के लिए बांग्ला भाषा के जानकार बिहार के पटना निवासी जीतेंद्र श्रीवास्तव ने हमें इस बंगाली कविता का अनुवाद कर के भेजा है. आप भी पढ़ें…

छुट्टी का मजा

एक दिन छुट्टी मिले तो शहर को पीछे छोड़ सभी जानते हैं कहां जाना चाहते हैं
पिकनिक के लिए बार-बार… डायमंड हार्बर, डायमंड हार्बर, डायमंड हार्बरररररर
और यदि छुट्टी मिले तीन दिन-2
तब भाई धर्मतला मोड़ से सरकारी बस पकड़कर जाएं कहां-
दीघार्जुनपुर, दीघार्जुनपुर, दीघार्जुनपुर, दीघार्जुनपुर, दीघार्जुनपुरररररर
छुट्टी मिले एक माह-2
है रॉकेट बस, रास्ता है बारह घंटे का, वहां जाएं जहां नजदीक है पहाड़पुरी, वह जगह है-
वह जगह है सिलीगुड़ी, वह जगह है सिलीगुड़ी, वह जगह है सिलीगुड़ी, सिलीगुड़ीड़ीड़ीड़ीड़ी
सिलीगुड़ी से टॉय ट्रेन में चढ़ा जाए,
ट्रेन चले टिकी, टिकी, टिकी, टिकी, टिकी
पहाड़ के किनारे-किनारे चली है मेघ के देश में
मेघ जो चले जाते हैं आकाश की खिड़कियों में, उसका मुंह खुलता है कहां-
कंचनजंघाघाघा, कंचनजंघा, कंचनजंघा, कंचनजंघा, कंचनजंघाघाघाघा
झिक, झिक, झिक, झिक, झिक, झिक
उड़ने वाले जहाज के बारे में कोई कुछ भी कहे-2
रेलगाड़ी में ही है सबसे अधिक सुख
झिक, झिक, झिक, झिक, झिक, झिक
आगे हो कोई रेदर बेसन, देखते-देखते जाऊंगा हरेक स्टेशन
झिक, झिक, झिक, झिक, झिक, झिक
भाड़ में (मिट्टी का कुल्हड़) चाय पीने का सुख आकाश में कहां, इसका स्वाद मिलता है सिर्फ रेलगाड़ी में ही
टिक, टिक, टिक, टिक, टिक, टिक
एक पांव घुटने पर चढ़ाकर -2
जब गरम चाय की चुस्की लगाऊंगा
झिक, झिक, झिक, झिक, झिक, झिक
कितने लोग, कितने माट (मैदान), कितने घर-2 और तालाब के किनारे-किनारे सुपरीर साड़ी
झिक, झिक, झिक, झिक, झिक, झिक
सप्ताह दिन की जब मिले छुट्टी तो जाऊंगी सिमुलतलायययय
रोगामुदी लाल माटी का, ऊंट के कुबड़ के समान छोटे पहाड़
टिक, टिकी, टिक, टिकी, टिक, टिकी
वहां जाकर देखूंगी, सुदूर क्षितिज में डूबते हुए सूर्य भगवान को
टिक, टिकी, टिक, टिकी, टिक, टिकी

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