नई दिल्ली. बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान को काला हिरण शिकार मामले में जोधपुर की अदालत ने दोषी करार दिया है. अभिनेता को वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत दोषी करार दिया गया है. आपको जानकर हैरानी होगी कि सलमान खान को हिरण के शिकार मामले में अदालत तक घसीटकर लाने वाला समूह विश्नोई समाज के नाम से जाना जाता है. यह समाज पर्यावरण के प्रति अपनी श्रद्धा के लिए दुनियाभर में जाना जाता है. इतिहास की कई कहानियों को देखें तो इस समाज के सदस्यों ने पेड़-पौधों और पशुओं की रक्षा के लिए अपनी जान तक दे दी है. आपने हिरण के बच्चे को दूध पिलाती महिलाएं या हिरणों के छौनों को बोतल से दूध पिलाने की तस्वीरें देखी होंगी. ये तस्वीरें इस समाज के पर्यावरण प्रेमी होने का सबूत देती हैं.

जाम्भोजी के बताए नियमों का सख्ती से पालन
विश्नोई उत्तर भारत की एक जनजाति है, जो मुख्यतः राजस्थान में पाई जाती है. विश्नोई समाज अपने गुरु जाम्भोजी के बताए नियमों का सख्ती से पालन करता है. यह समाज जात-पात में विश्वास नहीं करता. गुरु जाम्भेश्वर या जाम्भोजी की शिक्षाओं का विश्नोइयों पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा था. इसीलिए इस सम्प्रदाय के लोग न तो मांस खाते हैं और न ही शराब पीते हैं. इस समाज का उसूल है जीव या प्राणि मात्र की रक्षा करना. इस समाज के सदस्य न तो कभी खुद किसी हरे पेड़ को काटते हैं और न ही किसी बाहरी व्यक्ति को अपने इलाके में हरा पेड़ काटने की इजाजत देते हैं. पशुओं के साथ इस समाज के सदस्यों का लगाव अपने परिवार जैसा ही होता है. यही वजह है कि बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान के काला हिरण का शिकार करने की घटना ने समाज के लोगों को झकझोर दिया.

विश्नोई समाज की कहानी पर बनी मारवाड़ी भाषा की फिल्म. (साभारःयूट्यूब/जितेंद्र विश्नोई)

खेजड़ी के वृक्ष की रक्षा में 363 विश्नोइयों ने दिया था बलिदान
राजस्थान में विश्नोई समाज को लेकर एक कहानी बहुत प्रसिद्ध है. यह कहानी 18वीं सदी की है जब मारवाड़ यानी जोधपुर रियासत में महाराजा अभय सिंह का राज था. राजा ने अपने महल के लिए सिपाहियों को लकड़ी लाने को भेजा. सिपाही खेजड़ली गांव पहुंच गए और खेजड़ी के वृक्ष काटने लगे. वहां मौजूद विश्नोई समाज की एक महिला ने उन्हें रोका. सिपाही नहीं माने तो वह महिला पेड़ से चिपक गई, लेकिन सिपाहियों ने उस पर भी कुल्हाड़ी चला दी. यह देखकर महिला की तीनों बेटियां भी अन्य पेड़ों से चिपक गई, जिन्हें भी सिपाहियों ने मार डाला. एक-एक करके समाज के 363 लोग पेड़ों से चिपकते रहे और सिपाही उनकी जान लेते रहे. यह बात जब राजा को पता चली तो वे दुखी हुए और खेजड़ली आए और गांव वालों से माफी मांगी. साथ ही यह वादा भी किया कि अब जिस इलाके में भी विश्नोई समाज के लोग रहेंगे वहां पेड़ नहीं काटे जाएंगे. तब से पेड़-पौधों के संरक्षण की यह परंपरा चली आ रही है.

(साभारः विश्नोईसमाज.ब्लॉग)