नई दिल्ली: कभी कटोरा प्रदर्शन तो कभी पकौड़ा प्रदर्शन. दिल्ली के व्यापारी सीलिंग को लेकर तरह-तरह के तरीके अपनाकर विरोध जता रहे हैं. सीलिंग को लेकर राजनीति भी जारी है. आम आदमी पार्टी और केंद्र सरकार के बीच कई बार तकरार हो चुकी है. कांग्रेस भी इसे लेकर एक्टिव है. केंद्र सरकार से मांग है कि वह तुरंत ही एक अध्यादेश या कानून लाकर सीलिंग को रोके और मास्टर प्लान के एक्ट में भी बदलाव करे. ऐसा नहीं होने पर व्यापारियों ने आज फिर दिल्ली बंद किया है. पहले के प्रदर्शनों की तरह लाखों दुकानें बंद हैं. रामलीला मैदान में रैली हो रही है. व्यापार बुरी तरह से प्रभावित है. दिल्ली लगभग ठप है. लोगों को ज़रूरत के सामान तक के लिए भटकना पड़ रहा है. ये कनफेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) तथा व्यापारी एवं वर्कर्स एसोसिएशन के संयुक्त तत्वावधान में हो रहा है. हम आपको बताते हैं कि आखिर सीलिंग विवाद है क्या और व्यापारियों की मांगें क्या है…

रिहाइशी इलाकों में खुली हैं दुकानें, कन्वर्जन चार्ज भरने पर नहीं हो रही थी कार्रवाई
नियमों के अनुसार रिहायशी इलाके में कारोबार नहीं चलाया जा सकता, लेकिन डीडीए और सरकार ने कारोबारी इलाके विकसित नहीं किए, इसलिए रिहायशी इलाकों में दुकानें खोलनी पड़ी. व्यापारियों की मांग थी कि सरकार कुछ तरीका निकालकर उनकी दुकानों को नियमित कर दे. साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने अवैध निर्माणों को गिराने का आदेश दिया. लेकिन इन दुकानों को बचाने के लिए एमसीडी द्वारा कन्वर्जन चार्ज का प्रावधान रखा गया. कारोबारी भी ये चार्ज देने को राजी हो गए थे और उन्होंने वर्ष 2012 तक इस कन्वर्जन चार्ज के रूप में एमसीडी को करोड़ों रुपए दिए. बाद में कारोबारी ये चार्ज भी देने से बचने लगे.

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अवैध निर्माणों को गिराने और सील करने के हैं आदेश
अवैध निर्माण के बदले सरकार ने कन्वर्जन चार्ज का प्रावधान किया. कारोबारियों ने ये चार्ज भी अदा नहीं किया. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इन दुकानों या प्रॉपर्टी को सील करने का आदेश देते हुए एक मॉनिटरिंग कमेटी का गठन किया. अब मॉनिटरिंग कमेटी की देख-रेख में उन्हीं दुकानों को सील किया जा रहा है, जिन्होंने कन्वर्जन चार्ज जमा नहीं कराया. कन्वर्जन चार्ज न देने वालों का निर्माण अवैध होने पर उसे गिराने का भी आदेश है. कन्वर्जन चार्ज नहीं जमा करने वाले व्यापारियों की संख्या लाखों में है. इसीलिए सीलिंग के विरोध में लाखों व्यापारी सड़क पर हैं.

इस मामले में कॉन्फेडरेशन ऑफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की आड़ में दिल्ली नगर निगम कानून 1957 के मूलभूत प्रावधानों को ताक पर रख सीलिंग की कार्रवाई की जा रही है. यह गलत है. इसके खिलाफ लगातार आंदोलन जारी रहेगा.