नई दिल्ली. ”सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहां, जिंदगानी गर कुछ रही तो, नौजवानी फिर कहां”. घुमक्कड़ों के लिए ये लाइनें ऊर्जा देती हैं. उन्हें महापंडित राहुल सांकृत्यायन की याद दिलाती है. हिन्दी का ऐसा विद्वान जिसने घुमक्कड़ी को शास्त्र कहा. हिन्दी में यात्रा संस्मरण लिखने के लिए जाना गया. खुद हजारों-हजार किलोमीटर की यात्राएं कर ऐसे-ऐसे साहित्य का सृजन किया, जिसे पढ़कर न सिर्फ घुमक्कड़ी को धर्म बनाने को जी चाहता है, बल्कि आपको घर बैठे ही उन स्थानों के बारे में इतिहास-भूगोल और समाज-शास्त्र की जानकारी हो जाती है. राहुल सांकृत्यायन को हिन्दी साहित्य को यात्रा संस्मरण यानी ‘ट्रैवलाग’ लिखना सिखाने वाला कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. आज इन्हीं महापंडित राहुल सांकृत्यायन की जयंती है. 9 अप्रैल 1893 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के पंदहा में जन्मे राहुल सांकृत्यायन ने यों तो कई रचनाएं की, लेकिन घुमक्कड़-शास्त्र को लेकर की गई उनकी कृतियां हिन्दी की धरोहर है. आज उनकी जयंती पर आइए जानते हैं घुमक्कड़ी के बारे में महापंडित के कुछ विचार.

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1- घुमक्कड़ क्‍यों दुनिया की सर्वश्रेष्‍ठ विभूति है? इसीलिए कि उसी ने आज की दुनिया को बनाया है. यदि आदिम-पुरुष एक जगह नदी या तालाब के किनारे गर्म मुल्‍क में पड़े रहते, तो वह दुनिया को आगे नहीं ले जा सकते थे. आदमी की घुमक्कड़ी ने बहुत बार खून की नदियां बहाई हैं, इसमें संदेह नहीं, और घुमक्कड़ों से हम हर्गिज नहीं चाहेंगे कि वह खून के रास्‍ते को पकड़ें, किंतु अगर घुमक्कड़ों के काफिले न आते-जाते, तो सुस्‍त मानव-जातियां सो जातीं और पशु से ऊपर नहीं उठ पातीं.

2- हां, मैं इसे भूलना ही कहूंगा, क्‍योंकि किसी समय भारत और चीन ने बड़े-बड़े नामी घुमक्कड़ पैदा किए. वे भारतीय घुमक्कड़ ही थे, जिन्‍होंने दक्षिण-पूर्व में लंका, बर्मा, मलाया, स्‍याम, कंबोज, चंपा, बोर्नियो और सेलीबीज ही नहीं, फिलिपाईन तक का धावा मारा था और एक समय तो जान पड़ा कि न्‍यूजीलैंड और आस्‍ट्रेलिया भी बृहत्तर भारत का अंग बनने वाले हैं; लेकिन कूप-मंडूकता तेरा सत्‍यानाश हो! इस देश के बुद्धुओं ने उपदेश करना शुरू किया कि समुंदर के खारे पानी और हिंदू-धर्म में बड़ा वैर है, उसके छूने मात्र से वह नमक की पुतली की तरह गल जाएगा. इतना बतला देने पर क्या कहने की आवश्‍यकता है कि समाज के कल्‍याण के लिए घुमक्कड़-धर्म कितनी आवश्‍यक चीज है? जिस जाति या देश ने इस धर्म को अपनाया, वह चारों फलों का भागी हुआ और जिसने इसे दुराया, उसके लिए नरक में भी ठिकाना नहीं. आखिर घुमक्कड़-धर्म को भूलने के कारण ही हम सात शताब्दियों तक धक्‍का खाते रहे, ऐरे-गैरे जो भी आए, हमें चार लात लगाते गए.

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3- कोई-कोई महिलाएं पूछती हैं – क्या स्त्रियां भी घुमक्कड़ी कर सकती हैं, क्या उनको भी इस महाव्रत की दीक्षा लेनी चाहिए? इसके बारे में तो अलग अध्‍याय ही लिखा जाने वाला है, किंतु यहां इतना कह देना है, कि घुमक्कड़-धर्म ब्राह्मण-धर्म जैसा संकुचित धर्म नहीं है, जिसमें स्त्रियों के लिए स्‍‍थान नहीं हो. स्त्रियां इसमें उतना ही अधिकार रखती हैं, जितना पुरुष. यदि वह जन्‍म सफल करके व्‍यक्ति और समाज के लिए कुछ करना चाहती हैं, तो उन्‍हें भी दोनों हाथों इस धर्म को स्वीकार करना चाहिए. घुमक्कड़ी-धर्म छुड़ाने के लिए ही पुरुष ने बहुत से बंधन नारी के रास्‍ते में लगाए हैं. बुद्ध ने सिर्फ पुरुषों के लिए घुमक्कड़ी करने का आदेश नहीं दिया, बल्कि स्त्रियों के लिए भी उनका वही उपदेश था.

4- कौन समय है जबकि तरुण को महाभिनिष्क्रमण करना चाहिए? मैं समझता हूं इसके लिए कम-से-कम आयु 16-18 की होनी चाहिए और कम-से-कम पढ़ने की योग्‍यता मैट्रिक या उसके आसपास वाली दूसरी तरह की पढ़ाई. मैट्रिक से मेरा मतलब खास परीक्षा से नहीं है, बल्कि उतना पढ़ने में जितना साधारण साहित्‍य, इतिहास, भूगोल गणित का ज्ञान होता है, घुमकक्‍ड़ी के लिए वह अल्‍पतम आवश्‍यक ज्ञान है. मैं चाहता हूं कि एक बार चल देने पर फिर आदमी को बीच में मामूली ज्ञान के अर्जन की फिक्र में रुकना नहीं पड़े.

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5- घुमक्कड़ी का अंकुर किसी देश, जाति या वर्ग में सीमित नहीं रहता. धनाढ्य कुल में भी घुमक्कड़ पैदा हो सकता है, लेकिन तभी जब कि उस देश का जातीय जीवन उन्‍मुख हो. पतनशील जाति में धनाढ्य होने का मतलब है, उसके व्‍यक्तियों का सब तरह से पतनोन्‍मुख होना.

6- घुमक्कड़ धर्म किसी जात-पांत को नहीं मानता, न किसी धर्म या वर्ण के आधार पर अवस्थित वर्ग ही को. यह सबसे आवश्‍यक है कि एक घुमक्कड़ दूसरे को देखकर बिलकुल आत्‍मीयता अनुभव करने लगे – वस्‍तुत: घुमक्कड़ों के विकास के उच्‍चतल की यह कसौटी है. जितने ही उच्‍च श्रेणी के घुमक्कड़ होंगे, उतना ही वह आपस में बंधुता अनुभव करेंगे और उनके भीतर मेरा-तेरा का भाव बहुत-कुछ लोप हो जाएगा.

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7- फोटोग्राफी सीखना भी घुमक्कड़ के लिए उपयोगी हो सकता है. आगे हम विशेष तौर से लिखने जा रहे हैं कि उच्‍चकोटि का घुमक्कड़ दुनिया के सामने लेखक, कवि या चित्रकार के रूप में आता है. घुमक्कड़ लेखक बनकर सुंदर यात्रा-साहित्‍य प्रदान कर सकता है. यात्रा-साहित्‍य लिखते समय उसे फोटो-चित्रों की आवश्‍यकता मालूम होगी. घुमक्कड़ का कर्तव्‍य है कि वह अपनी देखी चीजों और अनुभूत घटनाओं को आने वाले घुमक्कड़ों के लिए लेखबद्ध कर जाए. आखिर हमें भी अपने पूर्वज घुमक्कड़ों की लिखी कृतियों से सहायता मिली है, उनका हमारे ऊपर भारी ऋण है, जिससे हम तभी उऋण हो सकते हैं, जब कि हम भी अपने अनुभवों को लिखकर छोड़ जाएं.

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