इलाहाबाद: हाईकोर्ट इलाहाबाद ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि सेवानिवृत्त कर्मचारी से बकाया की वसूली किए जा सकने का कोई नियम नहीं है और किसी नियम के अभाव में कोई वसूली नहीं की जा सकती है.

सेवानिवृत्त देयकों से की गयी कटौती का आदेश निरस्त

वन विभाग इलाहाबाद के अवकाश प्राप्त कर्मचारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह निर्णय दिया और याची के सेवानिवृत्त परिलाभों से की गई कटौती को गलत मानते हुए इस संबंध में जारी आदेश को समाप्त कर दिया है .तथा कर्मचारी को रिटायर होने की तारीख से 7% ब्याज के साथ समस्त देयों का भुगतान 6 माह के भीतर करने के निर्देश संबंधित विभाग को दिए हैं.

क्या है मामला ?

ज्ञातव्य है कि सुरेंद्र बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश वन निगम इलाहाबाद में लॉजिंग प्रबंधक के पद पर कार्यरत थे. 31 जुलाई 2015 को जब वह सेवानिवृत्त हुए तो उन्हें बताया गया कि उन पर पुराने अग्रिम का भुगतान बकाया है . जिसका उसने कोई बिल वाउचर प्रस्तुत नहीं किया है .इसलिए उसके परिलाभों से 930 67.25 रुपये काटने के बाद ही भुगतान किया जाएगा. विभाग द्वारा उसे स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया गया कि उस पर कितना बकाया है . और उसे अपना पक्ष रखने का मौका भी नहीं दिया गया .याचिका में उसके द्वारा कहा गया कि बिना किसी नियम के एक पक्षीय वसूली करना अनुचित है.

ब्याज के साथ समस्त देयकों के भुगतान के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब राज्य बनाम रफीक मसीह के वाद में कहा है , कि सेवानिवृत्ति के बाद की गई वसूली कर्मचारी के परिवार को प्रभावित करती है इसलिए यह अनुचित है . कोर्ट ने सुनवाई करते हुए वन विभाग के अवकाश प्राप्त कर्मचारी की सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले देयकों से कटौती किए जाने को गलत बताते हुए कटौती के आदेश को रद्द कर दिया है. और कर्मचारी के रिटायर होने की तारीख से 7% ब्याज के साथ समस्त देयों का भुगतान 6 माह के भीतर करने के निर्देश दिए हैं.