गाजियाबाद: जिन पर अपराध रोकने की जिम्मेदारी थी, वही अपराधी बन गए. दिल्ली पुलिस के दो अधिकारियों ने मुंबई के आभूषण विक्रेता से लगभग नौ किलोग्राम की सोने की चेनों को लूट की. दिल्ली पुलिस ने दोनों को अरेस्ट कर लिया है. इन दोनों ने मेडिकल लीव लेकर घटना को अंजाम दिया था. शक के आधार पर पुलिस ने इनसे पूछताछ की तो लुटेरे यही निकले. दोनों ने 18 मार्च को पुलिस की वर्दी में साहिबाबाद रेलवे स्टेशन के बाहर इस लूटकांड को अंजाम दिया था. दोनों पुलिस अधिकारियों के पास से लगभग छह किलोग्राम सोना बरामद हुआ है. दोनों लूट के लिए छुट्टी लेते थे. घटना के दिन भी दोनों मेडिकल लीव पर थे.

पहले भी लूट में शामिल रहे हैं दोनों अधिकारी
उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजी) प्रशांत कुमार ने प्रेस कांफ्रेंस कर बताया कि गिरफ्तार पुलिसकर्मी दिल्ली पुलिस के उप निरीक्षक सतेंद्र सिंह और ब्रह्मपाल सिंह हैं. दोनों बुलंदशहर जिले के रहने वाले हैं. उन्होंने बताया कि पेशेवर लुटेरों और दिल्ली पुलिस के इन दो अधिकारियों के बीच खतरनाक गठजोड़ था. कुमार ने बताया, ‘उन्होंने अपराध कबूल करते हुए खुलासा किया है कि मेरठ स्थित आनंद ज्वैलर्स के एक विक्रेता शैलेंद्र यादव ने सोने की इतनी बड़ी खेप के मेरठ से दिल्ली जाने की जानकारी दी थी. शैलेंद्र इससे पहले पुलिस का मुखबिर रह चुका है.’ उन्होंने बताया, ‘लगभग 10 साल पहले ऐसे ही एक मामले में दोनों अधिकारी शामिल थे.’

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18 मार्च को हुई थी घटना, लूट के लिए छुट्टी लेते थे दोनों पुलिस अधिकारी
18 मार्च को मुंबई के राकेश संघवी की यूनियन चेंस एंड ज्वेलर्स प्राइवेट लिमिटेड के सेल्स मैनेजर रोहित जैन से साहिबाबाद में नौ किलो सोना लूट लिया गया था. ये व्यापारी मेरठ से दिल्ली के लिए निकला था. दोनों पुलिस अधिकारियों ने अपने अन्य दो साथियों के साथ लूट करने मेरठ पहुंच गए थे. चारों ने मेरठ से सराफा कारोबारी के कर्मचारियों का पीछा किया और साहिबाबाद थाना इलाके में लूट की घटना को अंजाम दिया. इस घटना के आरोपी आरोपी एएसआई सतेंद्र दिल्ली के गाजीपुर और ब्रह्मपाल सिंह कल्याणपुरी थाने में तैनात थे.

‘हाफ एनकाउंटर’ शब्द ने पुलिस को दिलाई सफलता
घटना के बाद पुलिस टीम पीड़ितों के साथ साहिबाबाद स्थित घटनास्थल पर पहुंची. लुटेरे पुलिस अधिकारियों ने जब सराफा कारोबारी के मैनेजर रोहित जैन को करनगेट पुलिस चौकी के पास कार से उतारा, तो उन्होंने बोला था कि इसका ‘हाफ एनकाउंटर’ कर दो. इसके बाद पुलिस अधिकारियों को बदमाशों के गैंग की बजाय किसी पुलिसकर्मियों के गैंग पर शक हुआ. शक इसलिए हुआ क्योंकि ‘हाफ एनकाउंटर’ जैसा शब्द पुलिस ही इस्तेमाल करती है. जांच में तार जुड़ते गए और पुलिस लुटेरे अपराधियों तक पहुँच गई.