नई दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने गोरखपुर में सरकार द्वारा संचालित एक अस्पताल को आक्सीजन की आपूर्ति करने वाली फर्म के मालिक को जमानत दे दी है. इस सरकारी अस्पताल में पिछले साल अनेक बच्चों की मृत्यु हो गई थी. न्यायालय ने मनीष भंडारी को जमानत देते समय इस तथ्य का संज्ञान लिया कि वह एक ऐसे अपराध के लिए सात महीने से जेल में हैं, जिसके लिए अधिकतम सजा तीन साल है और इस मामले में आरोप पत्र भी दाखिल हो चुका है. मनीष भंडारी ने उसकी जमानत याचिका अस्वीकार करने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी.

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा , अपीलकर्ता द्वारा हिरासत में बिताई गई अवधि जो करीब सात महीने है और भारतीय दंड संहिता की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) के लिए निर्धारित सजा तीन साल है तथा इस मामले में आरोप पत्र दाखिल हो जाने के तथ्य को ध्यान में रखते हुये हम उसे उन शर्तो पर जमानत पर रिहा करने का आदेश देते है जो निचली अदालत के न्यायाधीश लगाना उचित समझें.

पीठ ने भंडारी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी की इस दलील पर विचार किया कि आरोपी ऐसे अपराध के आरोप में सात महीने से जेल में है जिसकी अधिकतम सजा तीन साल है. रोहतगी ने कहा कि यह एक स्वीकार्य तथ्य है कि इन बच्चों की मृत्यु कम आक्सीजन की आपूर्ति की वजह से नहीं बल्कि जापानी एंसेफेलाइटिस बीमारी से हुई. उन्होंने राज्य सरकार के रूख का भी हवाला दिया और कहा कि मीडिया ट्रायल का खामियाजा भी आरोपी भुगत रहा है.

गोरखपुर में सरकार द्वारा संचालित बाबा राघव दास मेडिकल कालेज में अगस्त, 2017 में एक सप्ताह के भीतर ही साठ से अधिक बच्चों की मौत हो गई थी, जिनमें से अधिकतर नवजात थे. इस घटना को लेकर आरोप लगा था कि आपूर्तिकर्ता ने बिलों का भुगतान नहीं होने के कारण आक्सीजन की आपूर्ति बाधित की जिसकी वजह से ये मौते हुई.

उच्च न्यायालय ने 13 फरवरी को भंडारी की जमानत याचिका यह कहते हुए अस्वीकार कर दी थी कि अदालत यह दलील स्वीकार कर रहा है कि आरोपी से हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता हो सकती है. इसलिए उसे अभी जमानत देना उचित नहीं होगा.