नई दिल्ली. रोहिंग्या बिना किसी देश वाली दुनिया की सबसे बड़ी आबादी है. इनकी कुल संख्या लगभग 10 लाख है और इसमें से ज्यादातर उत्तरी राखिने, म्यांमार में बसी हुई है. धर्म से ये मुस्लिम हैं. म्यांमार की सरकार इन्हें नागरिक के रूप में मान्यता नहीं देती है और इसी का नतीजा है कि इनके साथ वैध उत्पीड़न किया जा रहा है. इनके ऊपर कई तरह के प्रतिबंध हैं, जैसे उनकी गतिविधि, इकॉनमी पर पहुंच, शिक्षा, स्वास्थ्य और बाकी अधिकार, ये सब इन्हें गरीबी में जकड़े हैं और ये दयनीय जिंदगी जीने को मजबूर हैं.

म्यांमार के 1982 के नागरिकता कानून के मुताबिक, ‘एक रोहिंग्या (या किसी अन्य एथनिक अल्पसंख्यक) को नागरिकता के लिए योग्य तब माना जाएगा, जब वह साबित कर देगा/देगी कि उसके पूर्वज देश में 1823 से पहले रहे थे।’ इस कानून के अंतर्गत जिनका बहुसंख्यक बर्मन, कचिन, कायाह, करेन, चिन, मोन, राखिने या शैन एथनिक ग्रुप से संबंध है वही देश के नागरिक होंगे. ज्यादातर रोहिंग्या म्यांमार में 1823 के बाद बसे हैं, ऐसे में म्यांमार अपने नागरिकता कानून के आधार पर उन्हें देश का नागरिक नहीं मानता. इसी आधार को तर्क बनाते हुए म्यांमार ने आज तक रोहिंग्याओं को पूर्ण नागरिकता नहीं दी है.

कम से कम 135 एथनिक ग्रुप्स 1982 में म्यांमार के नागरिक बन गए लेकिन इसमें रोहिंग्या शामिल नहीं थे. नागरिकता की अन्य श्रेणियां तकनीकि रूप से रोहिंग्याओं के लिए खुली हुई हैं लेकिन वास्तविक रूप में इन्हें लेकर स्वीकार्यता असंभव है. 15वीं सदी या इससे पहले, रोहिंग्याओं के निशान राखिने में मिलते हैं लेकिन आज उनके लिए आधिकारिक नाम ‘बंगाली’ है. म्यांमार सरकार मानती है कि वे (रोहिंग्या) राखिने में तब आए जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने वहां अपना ऐक्सपेंशन किया और ऐसा बर्मा के राजा को 1826 में हराने के बाद किया गया. (यही वजह है कि 1948 और 1826 के नागरिकता कानूनों के अंतर्गत कट ऑफ डेट 1823 ही रखी गई है). बर्मन, चीनी, मलाय, थाई मुस्लिमों के म्यांमार सरकार के साथ बेहतर संबंध है. रोहिंग्या जातीयता (रैशली) के आधार पर भी अलग हैं.

रोहिंग्या ऐक्टिविस्ट्स के मुताबिक, 1948 के बाद से ऐसे कई रेफरेंसेज हैं जो बतौर नागरिक उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता को इंगित करते हैं. इसी में से एक बर्मा के पहले राष्ट्रपति यू नू का बयान है, जो उन्होंने 25 सितंबर 1954 को दिया था. ऐसा माना जाता है कि उन्होंने इस दिन कहा था कि जो लोग मौंगडोव, बुथीडॉन्ग (रोहिंग्या आबादी वाले क्षेत्र जो राखिने में हैं) में रहते हैं, वो रोहिंग्या, बर्मा के ऐथनिक्स हैं.

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मई 1961 से लेकर अक्टूबर 1965 तक, यंगून में बर्मा ब्रॉडकास्टिंग सर्विस हफ्ते में तीन बार एक रोहिंग्या लैंग्वेज प्रोग्राम भी ब्रॉडकास्ट करती थी और यंगून यूनिवर्सिटी रोहिंग्या स्टूडेंट्स असोसिएशन, उन कई ऐथनिक स्टूडेंट असोसिएशंस में थी जो 1959 फंक्शंड थी. रोहिंग्याओं ने 1948 से 2010 तक के हर चुनाव में वोट भी किया, हर बार उन्हें टेंपररी स्क्रूटनी कार्ड जारी किया गया जिसका सीधा मतलब था था कि उन्हें नागरिकता नहीं दी जा रही है.

यूरोप के ब्लॉगर और रोहिंग्या ऐक्टिविस्ट ने सैन ल्विन लिखते हैं, ‘एक नया नेशनल स्क्रूटनी कार्ड 1989 में जारी किया गया लेकिन रोहिंग्या उसे हासिल करने योग्य नहीं थे क्योंकि 1982 का नागरिकता कानून लागू हो चुका था. हालांकि, अथॉरिटीज ने टेंपररी स्क्रूटनी कार्ड सभी को जारी किया और 2008 के संवैधानिक रेफरेंडम और 2010 के चुनाव में वादा किया किया कि सभी रोहिंग्याओं को नेशनल सिक्यॉरिटी कार्ड जल्द जारी किए जाएंगे. लेकिन रोहिंग्याओं से किए गए किसी भी वादे का कभी सम्मान नहीं किया गया.’

Rohingya Muslims(Photo credit: Getty images)
रोहिंग्या मुस्लिम (Getty images)

2010 के चुनाव में, रोहिंग्या पार्टियों ने हिस्सा भी लिया था लेकिन उनका कोई उम्मीदवार जीत नहीं सका. मिलिटरी यूनियन सोलिडैरिटी डेवलपमेंट पार्टी (यूएसडीपी) ने तीन रोहिंग्या सांसदों को संसद में भेजा. इसके बाद 2015 के चुनाव में रोहिंग्याओं को मताधिकार से वंचित कर दिया गया. ये म्यांमार का पहला पूरी तरह लोकतांत्रिक तरीके से हुआ चुनाव था.

2012 में, देश में रोहिंग्या और बौद्धों के बीच हिंसा हुई, जिसकी शुरुआत राखिने की बौद्ध महिला के साथ रेप और मर्डर के बाद हुई. ह्यूमन राइट्स वाच ने सैटलाइट तस्वीरें जारी की जिसमें रोहिंग्या गांव जलते हुए दिखाई दे रहे थे. हजारों रोहिंग्या बांग्लादेश भाग जाने को मजबूर हुए जबकि राखिने में यूएन के सुपरविजन में कैंप्स स्थापित किए गए. 1 लाख 40 हजार लोग अभी भी इन कैंपों में रह रहे हैं. इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप ने कहा कि यही वक्त था जब एआईएसए ने जन्म लिया.

9 अक्टूबर 2016 को, राखिने क्षेत्र में, बांग्लादेश से लगे म्यांमार के बॉर्डर पोस्ट पर हुए आर्म्ड अटैक में म्यांमार के 9 पुलिसकर्मी मारे गए. इस हमले की जिम्मेदारी एआरएसए ने ली. 8 हमलावर भी इसमें मारे गए. पिछले कुछ सालों से, म्यांमार की सेना पर रोहिंग्याओं के मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लग रहे हैं. यूएन ह्युमन राइट काउंसिल द्वारा अपॉइंट की गई फैक्ट फाइंडिंग कमिटी को इन आरोपों की जांच करने के लिए देश में घुसने तक नहीं दिया गया. 25 अगस्त को, एआईएसए ने पुलिस पोस्ट पर हमले के संचालन और एक आर्मी बेस पर रेड की कोशिश की जिम्मेदारी ली. म्यांमार सिक्यॉरिटी फोर्स की जवाबी कार्रवाई ने ढाई लाख रोहिंग्याओं को बांग्लादेश जाने को मजबूर किया.

Rohingya Muslims
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एआरएसए का एक हमला म्यांमार सरकार द्वारा राखिने पर कोफी अन्नान के नेतृत्व वाली अडवाइजरी कमिटी की रिपोर्ट के एक दिन बाद होता है. पिछले सितंबर में अपॉइंट की गई कमिटी ने 1982 के सिटिजनशिप लॉ को रिव्यू करने पर जोर दिया और धीमे सिटिजन वेरेफिकेशन पर भी ध्यान दिलाया, जिसमें 2014 से अभी तक सिर्फ 10 हजार रोहिंग्याओं को ही कवर किया गया है.

रोहिंग्याओं पर चुप्पी के लिए आंग सान सू ची को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना झेलनी पड़ी है. यही नहीं, म्यांमार में लोकतंत्र की लड़ाई के लिए मिला नोबेल पुरस्कार लौटाने की आवाजें भी सुनाई दे रही हैं. लेकिन सू ची की ही कोशिशों से अन्नान कमीशन बिठाया गया और उन्होंने उसकी रिपोर्ट का स्वागत भी किया. उनके ऑफिस ने कहा है कि सिफारिशों से सामंजस्य बिठाने और विकास के लिए मदद मिलेगी. कहा गया कि ज्यादातर सिफारिशों को जहां तुरंत लागू किया जाएगा वहीं कुछ को जमीनी अध्ययन के बाद अमलीजामा पहनाया जाएगा. हालांकि हम मानते हैं कि प्रगति तेज गति से होगी. हालांकि ताकतवर मिलिटरी ने इस रिपोर्ट को रिजेक्ट ही कर दिया है.

भारत 2012 से ही म्यांमार की घटना पर चिंता जताता रहा है. म्यांमार की सिक्योरिटी फोर्स की जवाबी कार्रवाई ने रोहिंग्याओं को विद्रोही बनाने की संभावना भी बढ़ा दी है. दुनिया के इस्लामिक देशों में भी इस बात को लेकर डर बैठा हुआ है. भारत मानता है कि शांत डिप्लोमेसी ही इसके लिए एकमात्र रास्ता है लेकिन वह लगातार इन हालात में घिरता जा रहा है. कोई नहीं मानता कि ये संकट जल्द सुलझने जा रहा है. रोहिंग्याओं को नागरिक के तौर पर स्वीकार करने के लिए म्यांमार को अकेले छोड़ देना ही एकमात्र रास्ता है. यही वजह है कि गृह मंत्रालय की 40 हजार रोहिंग्याओं को वापस भेजने की योजना समयपूर्व लिया गया फैसला नजर आती है. ऐसी कोई जगह ही नहीं, जहां उन्हें डिपोर्ट किया जाए. वह किसी देश से संबंध रखते ही नहीं हैं और कोई देश उन्हें चाहता ही नहीं है.