नई दिल्ली: बीजेपी प्रेसिडेंट अमित शाह के बेटे जय शाह की मानहानि मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया को जमकर झिड़का. शीर्ष कोर्ट ने भाजपा जय शाह द्वारा न्यूज पोर्टल द वायर और उसके पत्रकारों के खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि की शिकायत पर 12 अप्रैल तक कार्यवाही नहीं करने का गुजरात की निचली अदालत को निर्देश दिया. इसके साथ ही कोर्ट ने मीडिया, विशेषकर इलेक्ट्रानिक मीडिया, को किसी भी व्यक्ति के खिलाफ जो मन में आया उसे पेश करने पर झिड़की भी लगाई.

बेहद नाराज नजर आ रहे चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने मीडिया, विशेषकर टीवी चैनलों और न्यूज पोर्टल को फटकार लगाते हुए सवाल किया, ”क्या कोई सरकारी या सार्वजनिक दायरे में उपलब्ध किसी चीज को दुबारा पेश कर सकता है और उसमें कुछ अपमानजनक जोड़ सकता है. क्या इस तरह के संकेत बचाव के लिए हैं या स्वतंत्रता के लिए.”

कुछ लोग सोचते पोप के सिंहासन पर बैठे हैं
चीफ जस्टिस ने कहा, ”क्या वे जो मन में आएगा वह लिख सकते हैं ? जो वे लिखते हैं, वह कभी कभी न्यायालय की गंभीर अवमानना जैसा होता है. क्या यही पत्रकारिता है? इलेक्ट्रानिक मीडिया को अधिक जिम्मेदार होना चाहिए. मैं चैनलों के नाम नहीं लेना चाहता परंतु कुछ लोग सोचते हैं कि वे पोप के सिंहासन पर बैठे हैं और फैसले सुना रहे हैं. उन्हें और अधिक जिम्मेदार होना चाहिए और उन्हें इसका अहसास होना चाहिए.” इस बेंच में प्रधान न्यायाधीश के साथ न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और जस्टिस धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ भी इस खंडपीठ में शामिल थे.

शाह और अन्‍य से मांगा दो सप्‍ताह में जवाब
पीठ ने शाह और उन अन्य सह याचिकाकर्ता को नोटिस जारी किए जिन्होंने न्यूज पोर्टल और लेखिका रोहिणी सिंह सहित उसके पत्रकारों के खिलाफ मानहानि की शिकायत दायर की थी. पीठ ने उन्हें दो सप्ताह के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया है. पीठ ने कहा, ” इस बीच, शिकायतकर्ता शाह के वकील मजिस्ट्रेट को शीर्ष कोर्ट में लंबित मामलों के बारे में अवगत कराएंगे. हम जानते हैं कि मजिस्ट्रेट इसका संज्ञान लेंगे ओर 12 अप्रैल तक इस मामले में आगे कार्यवाही नहीं करेंगे.”

देश में पत्रकारिता का गला घोंटा जा रहा है
इससे पहले, सुनवाई शुरू होते ही पोर्टल और पत्रकारों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि इस लेख में रिकॉर्ड से प्राप्त विस्तृत विवरण है, जो सार्वजनिक दायरे में है. उन्होंने कहा कि इसी तरह से देश में पत्रकारिता का गला घोंटा जा रहा है. एक पत्रकार को यह पूछने का अधिकार नहीं है कि किस तरह से लाभ 80 करोड़ रुपए तक हो गया. साथ ही उन्होंने कहा कि पत्रकारिता किस तरह पनपेगी.

संपादकों को पक्षकार बनाने की बात
पीठ ने कहा कि इसमें दो मुद्दे हैं- क्या लेख में अतिरिक्त जोड़े गए तथ्य मानहानिकारक हैं या नहीं और क्या उन संपादकों को, जो लेख का हिस्सा नहीं हैं, पक्षकार नहीं बनाया जाना चाहिए. एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचन्द्रन ने कहा कि यहां तक कि प्रबंध संपादक को भी इसमें घसीट लिया गया है.

शाह के वकील ने बताया अपमानजनक रिपोर्टिंग
शाह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने सिब्बल का प्रतिवाद करते हुए कहा कि वे कहते हैं कि तथ्य सार्वजनिक दायरे में हैं, परंतु क्या इस सूचना को चुनकर और उसमे कुछ और जोड़कर इस्तेमाल करने की इजाजत दी जा सकती है. यह अपमानजनक रिपोर्टिंग हैं.

वकील का सवाल, क्या तथ्यों को मंशा के तहत गढ़ सकते हैं?
कौल ने सवाल किया, क्या आप तथ्यों को चुनकर, मंशा के तहत उन्हें गढ़ सकते हैं. यह पैदा किया गया विवाद है. उन्होंने कहा कि यह विवाद पैदा किया गया है, क्योंकि शाह के पिता एक राजनीतिक दल के अध्यक्ष हैं और शुरू में उन्होंने शाह का पक्ष नहीं लिया.

खबर को गढ़ने की दलील दी
उन्होंने कहा कि द वायर द्वारा प्रकाशित खबर गढ़ी हुई कहानी है और यह गैर जिम्मेदाराना पत्रकारिता का नमूना है. उन्होंने कहा कि निचली अदालत और उच्च न्यायालय के विस्तृत और तर्कसंगत आदेश पर रोक नहीं लगानी चाहिए. कौल ने कहा कि बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल किसी की प्रतिष्ठा धूमिल करने के लिए नहीं किया जा सकता है. (इनपुट एजेंसी)