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कुछ साल पहले तक कार खरीदने से पहले ज्यादातर लोग सिर्फ कार की कीमत और माइलेज पर ही जोर देते थे और इसी वजह से कंपनियां भी कारों के प्रचार के दौरान माइलेज और कीमत पर ही ज्यादा जोर देती थीं. लेकिन रोड एक्सीडेंट की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए इधर कुछ सालों से लोगों ने कारों के सेफ्टी फीचर्स को काफी ज्यादा महत्व देना शुरू किया है और अब कार कंपनियां भी विज्ञापनों में बाकी फीचर्स के अलावा सेफ्टी फीचर्स को दिखाने पर काफी जोर देती हैं. दूसरी तरफ सरकार ने भी कुछ सेफ्टी फीचर्स को जरूरी बना दिया है जो कि कार के साथ देना अनिवार्य है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट उठाकर देखें तो रोड एक्सिडेंट में सालाना एक लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो रही है. इन सभी वजहों से सेफ्टी फीचर्स को लेकर लोग जागरूक हुए हैं. तो समझ लेते हैं कि कैसे चेक होती है कि कार की सेफ्टी और कैसे मिलती है सेफ्टी रेटिंग..
कार को एडल्ड और चाइल्ड सेफ्टी के आधार पर दो रेटिंग्स दी जाती हैं. इन दोनों ही पैमानों के आधार पर ऐसे रेटिंग दी जाती है कि कार में एडल्ट बैठा है तो दुर्घटना की स्थिति में उसे कितनी चोट आ सकती है और यदि कोई बच्चा बैठा है तो उसे कितनी चोट या सेफ्टी हो सकती है.
कारों की सेफ्टी टेस्ट करने के लिए क्रैश टेस्ट किया जाता है और इसे ग्लोबल NCAP द्वारा लगभग सभी कंपनियों का कारों का क्रैश टेस्ट (Car Crash Testing) किया जाता है. इसमें कारों के एयरबैग्स, सेफ्टी बेल्ट, बैक सेंसर, स्पीड अलर्ट समेत तमाम फीचर्स की जांच कार के क्रैश टेस्ट के जरिए की जाती है और फिर कार को 5 स्टार के दायरे में सेफ्टी रेटिंग दी जाती है. हालांकि इसमें कार के सभी वैरिएंट की जांच नहीं होती है.
NCAP द्वारा लगभग सभी कंपनियों की कारों का क्रैश टेस्ट किया जाता है. इस टेस्ट के लिए कार में सवारी के तौर पर इंसानी ढांचे वाले डमी का इस्तेमाल किया जाता है. टेस्ट के दौरान एक हार्ड ऑब्जेक्ट से कार की टक्कर कराई जाती है. इस दौरान कार में 4 से 5 डमी का इस्तेमाल किया जाता है. कार की बैक सीट पर बच्चे की डमी होती है. ये चाइल्ड सेफ्टी सीट पर फिक्स की जाती है. क्रैश टेस्ट के बाद कार के एयरबैग ने काम किया या नहीं? डमी कितनी डैमेज हुई? मानव शरीर रूपी डमी के किस अंग में कितनी चोट आई.. कार के सेफ्टी फीचर्स ने कितना काम किया? इन सब के आधार पर रेटिंग दी जाती है.
हालांकि ग्लोबल NCAP क्रैश टेस्ट को भारत सरकार की तरफ से वैलिड नहीं माना गया है. यही वजह है कि जिन कंपनियों की कारों को NCAP द्वारा कम रेटिंग दी जाती है उन्हें भी कोई फर्क नहीं पड़ता. उनके लिए ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) का टेस्ट ज्यादा मायने रखता है. क्योंकि ग्लोबल NCAP पर कुछ संस्थाओं द्वारा भेदभाव के आरोप भी लगाए गए जबकि ARAI पर अभी भेदभाव के सवाल तो नहीं उठे.
कहा जाता है कि लोग जब ग्लोबल NCAP के क्रैश टेस्ट रेटिंग पर भरोसा दिखाने लगे तो इसका प्रभाव कार निर्माता कंपनियों पर पड़ने लगा. इसके बाद कार कंपनियों ने NCAP से कॉन्टैक्ट करना शुरू कर दिया और कार कंपनियों ने NCAP को पैसे देकर अपनी कारों का क्रैश टेस्ट कराना शुरू कर दिया. इस टेस्ट को वो वॉलेंटियर टेस्ट का नाम देने लगे.
इस टेस्ट की खास बात ये होती है कि क्रैश टेस्ट का सारा खर्च कार बनाने वाली कंपनी उठाती है. यह भी सवाल उठे कि इस टेस्ट में पैसों के लेन-देन से कार की रेटिंग बेहतर हो जाती है. यानी NCAP द्वारा ये एक तरह की ब्लैकमेलिंग हो जाती है, जिसमें पहले नंबर्स कम दिए जाते हैं. बाद में पैसे के जरिए नंबर बढ़ाए जाते हैं. यही वजह है कि देश कुछ कंपनियां इस टेस्ट को सपोर्ट नहीं करतीं.
हालांकि भारत सरकार बहुत जल्द ही एक इंडिपेंडेंट कार एक्सीडेंट टेस्ट सॉल्यूशन लाने की तैयारी में है जो अलग-अलग स्टैंडर्ड्स के आधार पर कार की सेफ्टी रेटिंग जारी करेगा. भारत सरकार ने 2016 में Global NCAP जैसे सेफ्टी फीचर्स के आधार पर नई पैसेंजर कारों के लिए एक स्टार रेटिंग प्रोग्राम का ऑफर रखा था, लेकिन वह आइडिया जल्द ही फेल हो गया.
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