बिहार चुनाव में हुए थे फेल, अब बांकीपुर में मिली संजीवनी, बिहार में 'PK' की नवीन शुरुआत के मायने
Bankipur Bypoll Results 2026: बिहार की राजधानी बांकीपुर विधानसभा सीट पर 3 कैंडिडेट मैदान में थे. जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर (PK), नीरज सिन्हा (BJP) और रेखा गुप्ता (RJD). BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के राज्यसभा सांसद चुने जाने के बाद ये सीट खाली हुई थी. जिसके बाद उपचुनाव हुआ.
प्रशांत किशोर ने 2 अक्टूबर 2024 में जन सुराज पार्टी बनाई थी. (ANI)
- बांकीपुर से लगातार 5 बार विधायक रहे हैं नितिन नवीन
- चुनावी रणनीतिकार से उम्मीदवार बने प्रशांत किशोर
- 2022 में की थी जन सुराज यात्रा, 2024 में बनाई पार्टी
- 2025 के बिहार चुनाव में PK की पार्टी को नहीं मिली एक भी सीट
बिहार की राजधानी पटना के बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजे आ चुके हैं. इलेक्शन स्ट्रैटजिस्ट और जन सुराज पार्टी के प्रमुख प्रशांत किशोर ने यहां से प्रचंड जीत हासिल की है. चुनाव आयोग के लेटेस्ट डेटा के मुताबिक, प्रशांत किशोर ने 19246 वोटों से BJP कैंडिडेट नीरज सिन्हा को मात दी है. जिस सीट को लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी (BJP) का मजबूत गढ़ माना जाता था, वहां प्रशांत किशोर का शानदार प्रदर्शन सियासी हलकों को चौंका रहा है. बांकीपुर विधानसभा सीट पर बदलता ये ट्रेंड सिर्फ एक सीट का बदलाव नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीतिक सोच और मतदाताओं के नए रुझान का संकेत भी माना जा रहा है. आइए समझते हैं आखिर प्रशांत किशोर के वो 5 मास्टर स्ट्रोक, जिससे उन्होंने BJP के इस किले बांकीपुर में डेंट लगाई.
प्रशांत किशोर ने 2 अक्टूबर 2024 में जन सुराज पार्टी बनाई थी. नवंबर 2025 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने 243 में से 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. प्रशांत किशोर ने तेजस्वी यादव की सीट राघोपुर से चुनाव लड़ने का ऐलान किया था, लेकिन बाद में हट गए थे. जन सुराज पार्टी के लिए बिहार विधानसभा का चुनाव एक बड़ा रियलिटी चेक था. बिहार चुनाव में जन सुराज एक भी सीट नहीं जीत पाई. मढ़ौरा सीट पर पार्टी दूसरे नंबर पर रही. पार्टी का वोट शेयर 3.4% रहा. उसे कुल 16,77,583 वोट मिले.
इस करारी हार के बाद जन सुराज के वजूद और क्रेडिबिलिटी पर भी सवाल खड़े हो गए. इसके बाद प्रशांत किशोर ने कमबैक के लिए इंतजार किया. बांकीपुर को लेकर उन्होंने सॉलिड प्लानिंग की. ग्राउंड लेवल पर काम किया. अब उपचुनाव में इसके नतीजे दिख रहे हैं.
उपचुनाव में BJP को बड़ा झटका! बांकीपुर-दतिया में हार के करीब भाजपा, प्रशांत किशोर का दमदार आगाज
BJP का मजबूत किला है बांकीपुर
बांकीपुर BJP का मजबूत किला है. 1995 से यहां BJP चुनाव नहीं हारी है. प्रशांत किशोर जानते हैं कि अगर वे RJD या JDU के गढ़ में लड़ेंगे, तो उन्हें सीधे जातिगत अभेद्य दीवारों (जैसे यादव या कुर्मी-कोइरी ब्लॉक) का सामना करना पड़ेगा. फिलहाल इसे तोड़ना मुश्किल होता. इसलिए उन्होंने बांकीपुर को चुना था.
बांकीपुर का जातीय समीकरण?
बांकीपुर विधानसभा सीट को बिहार की सबसे हाई-प्रोफाइल और 'VIP' शहरी सीटों में गिना जाता है. चुनाव आयोग के मुताबिक, इस विधानसभा सीट पर 3,79,420 वोटर्स हैं. इस सीट पर कायस्थ वोटर्स सबसे निर्णायक माने जाते हैं. इस समाज के वोटरों की संख्या सबसे ज्यादा करीब 70,000 है. कायस्थों के बाद संख्या बल में भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और यादव वोटर्स की बड़ी आबादी है. कुछ पॉश सोसाइटी और वार्डों में यादव, वैश्य और कुर्मी वोटर्स भी अच्छी संख्या में हैं. इस सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 30 हजार से ज्यादा है. वहीं, दलित और महादलित मतदाताओं की संख्या करीब 31 हजार के आसपास है. BJP 1995 से लगातार जीतती आई है.
बांकीपुर उपचुनाव में BJP के 5 मास्टरस्ट्रोक
पदयात्रा: प्रशांत किशोर अपनी पदयात्रा के समय से ही 'राइट टू एजुकेशन' और 'बिहार के बच्चों को बिहार में ही रोजगार' देने का नैरेटिव सेट कर रहे थे. उन्होंने पारंपरिक जातिगत राजनीति को नकारने का दावा भी किया. इससे वोटर्स के साथ उनका कनेक्शन बढ़ता गया. बांकीपुर जैसे पढ़े-लिखे और शहरी क्षेत्र में उनकी इस नई सोच का असर होता दिख रहा है.
एंटी-इन्कंबेंसी का उठाया फायदा: इस सीट पर लंबे वक्त से BJP काबिज थी. लिहाजा एक एंटी-इन्कंबेंसी बन चुकी थी. प्रशांत किशोर ने इसी बात का फायदा उठाया. उन्होंने यूथ वोटर्स पर फोकस किया. बांकीपुर में करीब 1.10 लाख से ज्यादा युवा वोटर हैं, जिनकी उम्र 18 से 34 साल के बीच है.
बिहार में रोजगार वाला सेट किया नैरेटिव: PK ने बांकीपुर में 'बिहार में रोजगार' और 'भविष्य का बदलाव' वाला नैरेटिव सेट किया. PK की पार्टी ने इस युवाओं के जरिए BJP के पारंपरिक वोट बैंक में 20 से 25% की भी सेंधमारी की. छात्र आंदोलन के बाद सरकार विरोधी माहौल का लाभ जन सुराज को मिला है. पार्टी ने कैंपेन के दौरान बेरोजगारी और पेपर लीक का मुद्दा उठाया था. इससे प्रतियोगी छात्रों, पहली बार वोट डालने वाले युवाओं और शिक्षित वर्ग में उनकी स्वीकार्यता बढ़ी.
माइक्रो मैनेजमेंट: चुनावी रणनीतिकार के तौर पर सालों का अनुभव रखने वाले प्रशांत किशोर ने इस चुनाव में भी बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय रखा. हर वार्ड और मोहल्ले में अलग रणनीति अपनाई गई. स्थानीय मुद्दों और मतदाताओं के फीडबैक के आधार पर प्रचार अभियान तैयार किया गया. चुनाव प्रचार के दौरान रोजगार, सड़क, जल निकासी, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता दी गई. मतदाताओं के बीच यह मैसेज दिया गया कि चुनाव राष्ट्रीय नहीं, बल्कि स्थानीय समस्याओं के समाधान का है.
मजबूत ग्राउंड कैंपेन और उम्मीदवार की छवि: उपचुनाव के दौरान डोर-टू-डोर संपर्क, छोटी-छोटी जनसभाएं और लगातार जनसंपर्क अभियान चलाया गया गया. उम्मीदवार की स्थानीय पहचान और सक्रियता ने भी मतदाताओं का भरोसा जीतने में अहम भूमिका निभाई.
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