Bihar Assembly Election 2020: बिहार में इसी महीने शुरू होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज हैं. चिराग पासवान (Chirag Paswan) की पार्टी LJP ने रविवार को NDA से अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया है. हालांकि LJP ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह बिहार में JDU के खिलाफ उम्मीदवार उतारेगी लेकिन भाजपा के खिलाफ नहीं. इसके साथ-साथ उन्होंने यह भी कहा है कि जीतने वाले सभी उम्मीदवार BJP-LJP की सरकार बनाएंगे. Also Read - स्टार प्रचारक का दर्जा रद्द: कमलनाथ बोले- EC ने मुझे कोई नोटिस नहीं दिया, मेरे वकील देखेंगे इस मामले को

लोजपा ने राज्य-स्तर पर ‘वैचारिक मतभेद’ का हवाला दिया और कहा है कि वह ‘बिहार विजन डॉक्यूमेंट’ को लागू करना चाहता है. लोजपा की तरफ से कहा गया है कि ‘बीजेपी के साथ हमारा मजबूत गठबंधन है और बिहार में भी हम इस सहयोग को जारी रखना चाहते हैं. हमारे संबंधों में कोई खटास नहीं है.’ LJP की तरफ से यह फैसला JDU और नीतीश कुमार के साथ कई महीनों से चल रहे विवाद के बाद आया है. Also Read - Bihar Assembly Election 2020 : तेजस्वी का भाजपा पर निशाना, 'पहले महंगाई इनके लिए 'डायन' थी, अब 'भौजाई' बन गई'

JDU को बीजेपी-नीतीश कुमार गठबंधन में बहुमत मिलने का भरोसा है. तो दूसरी तरफ NDA के नेताओं के एक वर्ग का कहना है कि नीतीश कुमार को महीनों तक निशाने पर बनाए रखने का चिराग पासवान का कदम BJP के शीर्ष नेतृत्व के ‘मौन समर्थन’ के बिना संभव नहीं था. चिराग पासवान के इस कदम के बाद अब सवाल यह उठता है कि क्या बीजेपी नीतीश कुमार को पछाड़ना चाहती है? Also Read - यूपी में बीजेपी के लिए अब पहली चुनौती अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, क्‍या बसपा का ग्राफ गिरेगा?

चिराग पासवान का NDA से इतर चुनाव लड़ने का फैसला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई वाली JDU की चुनावी संभावनाओं को नुकसान पहुंचाने की कोशिश माना जा रहा है. लोजपा को उम्मीद है कि अगर जद (यू) का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहता है तो राज्य में NDA का नेतृत्व नीतीश कुमार के हाथों में बने रहने पर भी सवाल खड़े होंगे.

चिराग पासवान ने कहा कि लोजपा ने कई वजहों से राजग से अलग होने की घोषणा की है. इनमें 37 वर्षीय चिराग पासवान की अपनी क्षमता साबित करने की इच्छा भी शामिल है, जिन्होंने अपने पिता रामविलास पासवान से पार्टी की कमान अपने हाथ में ली है. इसके अलावा पार्टी जदयू से भी मुकाबले को तैयार है, क्योंकि उनका मानना है कि नीतीश कुमार उनके राजनीतिक आधार को कमजोर करने के लिए काम करते रहे हैं.

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि LJP के इस कदम से लालू यादव की राजद, कांग्रेस और वाम दलों का मुख्य विपक्षी गठजोड़ अपनी संभावनाएं बढ़ती देखेगा. विपक्षी गठबंधन को लगेगा कि केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की पार्टी का यह फैसला राजग के वोट कम कर सकता है. राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्य में नीतीश के नेतृत्व तथा राजग के व्यापक सामाजिक गठजोड़ के कारण सत्तारूढ़ गठबंधन को विपक्षी गठजोड़ के मुकाबले थोड़ा मजबूत माना जा रहा था, लेकिन LJP के फैसले ने अब नये समीकरणों को जन्म दे दिया है.

JDU के एक वरिष्ठ नेता ने नाम जाहिर नहीं होने की शर्त के साथ कहा कि BJP अध्यक्ष जेपी नड्डा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत पार्टी के आला नेताओं ने राज्य में गठबंधन की अगुवाई के लिए नीतीश पर भरोसा जताया है, वहीं मोदी ने भी हाल में कुछ कार्यक्रमों में अनेक बार बिहार के मुख्यमंत्री की प्रशंसा की है. उन्होंने कहा, ‘लोजपा अपनी ताकत कुछ ज्यादा ही आंक रही है. एक बार मोदी और नीतीश कुमार चुनाव प्रचार के दौरान राज्य में कुछ संयुक्त जनसभाओं को संबोधित कर देंगे तो सारा संशय दूर हो जाएगा.’

दूसरी तरफ लोजपा का मानना है कि राज्य में राजनीतिक शक्ति के रूप में नीतीश का असर फीका हो गया है और बड़ी संख्या में राजग के मतदाता चाहते हैं कि नये नेता को मौका मिले. लोजपा के परंपरागत समर्थन आधार में दलित वोटों की बड़ी संख्या गिनी जाती है और राज्य के विभिन्न हिस्सों में कुछ उच्च जाति के प्रभावशाली नेताओं में भी उसका प्रभाव है.

बता दें कि LJP ने राज्य में फरवरी 2005 में हुए चुनाव में भी इसी तरह की रणनीति अख्तियार की थी. तब वह केंद्र में कांग्रेस नीत संप्रग गठबंधन का हिस्सा थी, लेकिन बिहार में UPA के प्रमुख घटक दल राजद के खिलाफ लड़ी थी. शुरू में तो उसकी रणनीति काम आई और त्रिशंकु विधानसभा में लोजपा के 29 विधायक चुनकर आए.हालांकि, बाद में विधानसभा भंग हो गयी और नये सिरे से चुनाव हुए. लोजपा एक बार फिर अलग होकर लड़ी, लेकिन वह केंद्र में संप्रग में शामिल रही. हालांकि, इस बार जनता ने नीतीश कुमार की अगुवाई वाले राजग को स्पष्ट जनादेश दिया और 2005 में राज्य में लालू प्रसाद की राजद का 15 साल का शासन समाप्त हो गया.

(इनपुट: भाषा से भी )