नई दिल्ली. दिल्ली के आनंद विहार से बिहार के मुजफ्फरपुर के लिए रोजाना एक ट्रेन चलती है. इसका नाम है ‘सप्तक्रांति एक्सप्रेस’. वर्ष 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रेल मंत्री रहे बिहार के वर्तमान सीएम नीतीश कुमार ने इसकी शुरुआत की थी. जानते हैं इसका नाम सप्तक्रांति क्यों है? दरअसल, नीतीश कुमार खुद को समाजवादी नेता मानते हैं और देश में सबसे बड़े समाजवादी नेताओं में से एक डॉ. राममनोहर लोहिया को अपना प्रेरणास्रोत. डॉ. लोहिया ने ही देश के समुचित विकास और उत्थान के लिए सात क्रांतियों का प्रस्ताव दिया था. इसलिए रेल मंत्री रहते हुए नीतीश कुमार ने इस प्रखर समाजवादी विचारक को अपने तरीके से श्रद्धांजलि दी. Also Read - बिहार सीएम नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री से की 31 मई तक लॉकडाउन बढ़ाने की मांग, बताई ये वजह

फोटो साभारः इंडियन रेल इंफो

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क्या हैं ये सात क्रांतियां
डॉ. लोहिया अनेक सिद्धांतों, कार्यक्रमों और क्रांतियों के जनक रहे हैं. वे सभी अन्यायों के विरुद्ध एक साथ जेहाद बोलने के पक्षपाती थे. उन्होंने एक साथ सात क्रांतियों का आह्वान किया. वे सात क्रान्तियां ये थीं…
1. नर-नारी की समानता के लिए
2. चमड़ी के रंग पर रची राजकीय, आर्थिक और दिमागी असमानता के खिलाफ
3. संस्कारगत, जन्मजात जातिप्रथा के खिलाफ और पिछड़ों को विशेष अवसर के लिए
4. परदेसी गुलामी के खिलाफ और स्वतन्त्रता तथा विश्व लोक-राज के लिए,
5. निजी पूंजी की विषमताओं के खिलाफ और आर्थिक समानता के लिए तथा योजना द्वारा पैदावार बढ़ाने के लिए,
6. निजी जीवन में अन्यायी हस्तक्षेप के खिलाफ और लोकतंत्री पद्धति के लिए,
7. अस्त्र-शस्त्र के खिलाफ और सत्याग्रह के लिए Also Read - कन्हैया का नीतीश को अनुरोध, कहा-सीएए, एनआरसी व एनपीआर के खिलाफ कराएं प्रस्ताव पारित

डॉ. लोहिया को जानिए
स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी, प्रखर चिन्तक तथा समाजवादी राजनेता डॉ. राममनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को हुआ था. उन्हें भारतीय राजनीति का सबसे बेबाक नेता कहा गया है. क्योंकि जिस समय पं. नेहरू के नीतियों को देश के लिए अनिवार्य माना जाने लगा था, उस समय में डॉ. लोहिया उनकी नीतियों की सबसे ज्यादा आलोचना करते थे. उन्होंने न सिर्फ नेहरू की नीतियों की आलोचना की, बल्कि बतौर प्रधानमंत्री उनके व्यक्तिगत खर्चों को भी संसद में मुद्दा बनाया. सत्तारूढ़ कांग्रेस के दंभ को देखते हुए उन्होंने कहा, ‘जिंदा कौमें सरकार बदलने के लिए 5 साल तक इंतजार नहीं करतीं.’ ऐसे में जबकि समाजवाद और समाजवादियों के चाल-चरित्र और चेहरे पर आज सवाल उठ रहे हैं, लोहियाजी को याद करना जरूरी है. जाति व्यवस्था, हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बंटवारे और शासन तंत्र पर हमेशा मुखर रहने वाले इन्हीं डॉ. राममनोहर लोहिया की आज जयंती है.

जाति व्यवस्था और औरतों की हालत पर मुखर थे डॉ. लोहिया
भारत की जाति व्यवस्था को डॉ. लोहिया ने सबसे ज्यादा कठघरे में रखा है. उनका कहना था कि जाति व्यवस्था अवसर को सीमित करती है. सीमित अवसर क्षमता को संकुचित करता है. संकुचित क्षमता अवसर को और भी सीमित कर देती है. जहां जाति का प्रचलन है, वहां अवसर और क्षमता हमेशा से सिकुड़ रहे कुछ लोगों के दायरे तक सीमित है. वहीं इस देश में महिलाओं की चिंतनीय स्थिति पर भी डॉ. लोहिया ने कई बार लिखा और अपने भाषणों से लोगों तक आवाज पहुंचाई. उन्होंने कहा था, ‘इस देश की औरतों के लिए आदर्श सावित्री नहीं, द्रौपदी होनी चाहिए. भारतीय नारी द्रौपदी जैसी हो, जिसने कि कभी भी किसी पुरुष से दिमागी हार नहीं खाई.’