
Parinay Kumar
परिणय कुमार को पत्रकारिता में लगभग 14 साल का अनुभव है. वह करियर की शुरुआत से ही पॉलिटिकल और स्पोर्ट्स की खबरें लिखते रहे हैं. 2008 में बिहार के ललित ... और पढ़ें
Bihar News Hindi: चिराग पासवान इन दिनों अलग ही मोड में दिख रहे हैं. खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) का हनुमान बताते आए चिराग पासवान (Chirag Paswan) इन दिनों कई मुद्दों पर NDA से अलग रुख दिखा चुके हैं. इस बार तो उन्होंने मंत्री पद छोड़ने तक की बात कर दी. चिराग ने कहा कि अपने सिद्धांतों से समझौता करने के बजाय वह मंत्री पद छोड़ना पसंद करेंगे. चिराग के इस बयान से सियासी गलियारों में हलचल मच गई है. लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने सोमवार शाम पार्टी के अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ के एक समारोह में यह टिप्पणी की और कहा, ‘जब तक नरेंद्र मोदी मेरे प्रधानमंत्री हैं, तब तक हम राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में रहेंगे.’
उनकी टिप्पणी कि ‘मैं अपने पिता की तरह मंत्री पद छोड़ने में संकोच नहीं करूंगा’ के बारे में पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए चिराग ने दावा किया कि वह कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) के बारे में बोल रहे थे. उन्होंने कहा, ‘मेरे पिता भी UPA सरकार में मंत्री थे. उस समय बहुत सी ऐसी चीजें हुईं जो दलितों के हितों में नहीं थी. यहां तक कि बाबा साहब आंबेडकर की तस्वीरें भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में नहीं लगाई जाती थीं. इसलिए हमने अपने रास्ते अलग कर लिए.’
चिराग पासवान के बारे में माना जाता है कि उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले अपने पिता को भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले राजग के साथ फिर से गठबंधन करने के लिए सहमत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा करते हुए पासवान ने कहा कि मौजूदा सरकार दलितों के बारे में उनकी चिंताओं के प्रति संवेदनशील रही है और उन्होंने अपनी बात को पुष्ट करने के लिए नौकरशाही में ‘क्रीमी लेयर’ और ‘लेटरल एंट्री’ (सीधी भर्ती) पर केंद्र के रुख का उदाहरण दिया. हालांकि, राजग और ‘इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस (इंडिया) के सूत्रों का मानना है कि पासवान के भाषण में बाद में दिए गए उनके स्पष्टीकरण से कहीं अधिक बयानबाजी थी.
दोनों प्रतिद्वंद्वी गठबंधनों के सूत्रों का यह भी मानना है कि चिराग के पिता के इस्तीफे का मुद्दा उठाना कांग्रेस से ज्यादा भाजपा के लिए शर्मिंदगी की बात है, क्योंकि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान ही रामविलास पासवान ने गुजरात के 2002 के दंगों के विरोध में अपना कैबिनेट पद छोड़ दिया था. इसके बाद वह UPA में शामिल हो गए और 5 साल तक मंत्री पद पर रहे. रामविलास पासवान 2009 में अपनी लोकसभा सीट हार गए और मनमोहन सिंह के दूसरे मंत्रिमंडल में उन्हें जगह नहीं मिली.
न्यूज एजेंसी PTI ने सूत्रों के हवाले से यह भी कहा कि राहत कार्यों की निगरानी के लिए बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों का दौरा कर रहे चिराग पासवान अपना जनाधार मजबूत करने और भाजपा की छाया से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं. इसके अलावा, यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि चिराग पासवान ने अप्रत्यक्ष रूप से BJP नेतृत्व को यह जताने की कोशिश की है कि वह अपने चाचा पशुपति कुमार पारस के साथ भाजपा नेतृत्व की नजदीकियों से खुश नहीं हैं. पारस ने चिराग के दिवंगत पिता की लोक जनशक्ति पार्टी को तोड़ दिया था.
(इनपुट: भाषा)
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