नई दिल्ली. बिहार के मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार या एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (Acute Encephalitis Syndrome) से सोमवार को 10 और बच्चों की मौत हो गई. इसके साथ ही पिछले कुछ दिनों में बच्चों की मौत का यह आंकड़ा 100 के पार पहुंच गया है. ताजा समाचार मिलने तक यह आंकड़ा बढ़कर 107 हो गया है. मुजफ्फरपुर समेत उत्तर बिहार के कई जिलों में इस बीमारी के कारण हो रही बच्चों की मौत के बीच लगातार आलोचना झेल रही राज्य सरकार इस लाइलाज बीमारी का समाधान निकाल पाने में नाकाम रही है. इसको लेकर लगातार ये सवाल उठ रहे थे कि आखिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बीमारी से सर्वाधिक प्रभावित जिले मुजफ्फरपुर का दौरा कब करेंगे. खासकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के दौरे के बाद भी यह सवाल उठा था. अब जाकर यह खबर आई है कि नीतीश कुमार मंगलवार को मुजफ्फरपुर के एसकेएमसी अस्पताल का दौरा करेंगे.

इस बीच, केंद्रीय मानवाधिकार आयोग ने सोमवार को मुजफ्फरपुर समेत वैशाली, पूर्वी चंपारण, शिवहर, सीतामढ़ी जिले में मस्तिष्क ज्वर से बच्चों की मौत को लेकर नोटिस जारी किया. आयोग द्वारा बिहार सरकार और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को जारी किए गए इस नोटिस में बीमारी से बच्चों की मौत को लेकर विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है. साथ ही यह भी पूछा गया है कि मुजफ्फरपुर में इंसेफलाइटिस के वायरस के प्रसार को लेकर संबंधित एजेंसियों ने क्या-क्या इंतजाम किए हैं. विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि पिछले कुछ वर्षों में एईएस बीमारी के कारण बच्चों की लगातार मौत के बावजूद सरकार की तरफ से इससे बचाव के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए हैं.

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मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (SKMCH), जहां इस बीमारी से प्रभावित सर्वाधिक बच्चे भर्ती हैं, वहां भी दवाओं की कमी, डॉक्टरों की नामौजूदगी और बदइंतजामी को लेकर मीडिया में खबरें आई हैं. इन सबको देखते हुए ही आयोग ने यह नोटिस जारी किया है. मुजफ्फरपुर की एक अदालत में सोमवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन व बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय के खिलाफ एक मामला दायर किया गया. इन पर एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से बीते एक पखवाड़े में लापरवाही बरतने की वजह से 82 बच्चों की मौत का आरोप लगाया गया है.

एक दशक में हजार से ज्यादा बच्चों की मौत
अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार के मुजफ्फरपुर में कुपोषण और गरीबी के कारण AES बीमारी की चपेट में आने से सैकड़ों बच्चों की मौत हो चुकी है. वर्ष 2000 से लेकर 2010 के बीच ही इस बीमारी से एक हजार से ज्यादा बच्चे काल की गाल में समा गए. लेकिन न तो सरकार और न ही विशेषज्ञ इस बीमारी का कारण अब तक तलाश पाए हैं. हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि भीषण गर्मी, कुपोषण और प्रदूषित वातावरण की वजह से बच्चे इस बीमारी की चपेट में आते हैं. लीची खाने से भी बच्चों के इस बीमारी की जद में आने की बात कही गई, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अगर लीची से AES के होने के प्रमाण मिलते तो शहरी इलाके में रहने वाले बच्चों पर भी इसका प्रभाव पड़ता.

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महादलित समुदाय के बच्चे ज्यादा पीड़ित
एसकेएमसीएच, मुजफ्फरपुर के बाल रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. जीएस सहनी ने अखबार से बातचीत में कहा, ‘लीची को इस बीमारी का कारण मानना ठीक नहीं होगा, क्योंकि अगर ऐसा होता तो शहरी इलाकों के बच्चों पर भी इस बीमारी का प्रभाव पड़ता. लेकिन पिछले दो दशकों में शहरी इलाके के एक भी बच्चे के इस बीमारी की जद में आने की कोई रिपोर्ट नहीं है.’ विशेषज्ञों के मुताबिक गरीबी और कुपोषण, एईएस के प्रसार के पीछे सबसे प्रमुख वजह हैं. अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक एईएस से प्रभावित होने वाले बच्चे अत्यंत गरीब तबके से आते हैं. ये बच्चे बिहार के महादलित समुदाय यानी मुसहर या अन्य अनुसूचित जाति के तबके से हैं. आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के ये बच्चे भोजन की कमी से कुपोषण की जद में आते हैं, जिससे आसानी से एईएस की चपेट में आ जाते हैं.

गरीब बच्चों पर इसलिए अटैक करती है बीमारी
मस्तिष्क ज्वर या एईएस बीमारी का प्रभाव शरीर के कमजोर होने पर ज्यादा पड़ता है. अखबार की रिपोर्ट के अनुसार शरीर में जब शुगर लेवल घटता है, तो उपापचयी यानी मेटाबॉलिज्म प्रक्रिया के तहत शरीर में मौजूद फैटी-एसिड यानी वसा अम्ल ग्लूकोज की मात्रा बढ़ा देते हैं. लेकिन कुपोषित बच्चों में यही शारीरिक प्रक्रिया जानलेवा साबित होती है. कुपोषित बच्चे में फैटी एसिड जब ग्लूकोज बनाने की प्रक्रिया शुरू करते हैं, तो इससे शरीर के लिए लाभकारी तत्वों का उत्पादन बढ़ने के बजाय एक जहरीले पदार्थ MPCG (मिथिलीन साइक्लोप्रोपिलग्लीसिन) का उत्पादन होने लगता है. यही MPCG लीची में भी पाया जाता है. इसी वजह से लीची को एईएस होने का कारण कहा गया था, जबकि हकीकत यह है कि कुपोषण के कारण यह जहर शरीर में फैलता है.

मुजफ्फरपुर के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अरुण शाह ने टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ बातचीत में कहा कि शरीर में ग्लूकोज की मात्रा में यदि अचानक गिरावट आती है, तो प्राकृतिक रूप से अपने आप रिजर्व-ग्लूकोज से इसकी अतिरिक्त सप्लाई कर दी जाती है. लेकिन कुपोषित बच्चों के शरीर में रिजर्व ग्लूकोज की मात्रा न के बराबर होती है. अगर एईएस से प्रभावित बच्चे को फौरन से अतिरिक्त शुगर का डोज दिया जाए, तो उसकी जान बचाई जा सकती है, लेकिन इसमें महज आधे घंटे की देरी भी उसके लिए जानलेवा होती है. उन्होंने बताया कि इन बच्चों के घरों में अक्सर खाने की कमी देखी जाती है. भूख से बेचैन होकर ये बच्चे इसी कारण लीची खा लेते हैं, जिससे एईएस की चपेट में आ जाते हैं.