नई दिल्ली. बिहार में सत्तारूढ़ राजग गठबंधन सरकार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. यही वजह है कि पिछले कुछ दिनों में सीएम नीतीश कुमार के दो बयानों ने राजनीतिक रूप से सक्रिय प्रदेश की सियासत गर्मा दी है. दो दिन पहले ही राज्य स्तरीय बैंकर्स कमेटी की बैठक में नोटबंदी के फैसले की आलोचना के बाद नीतीश कुमार ने अब अपनी पुरानी मांग, बिहार को विशेष राज्य के दर्जे को दोहराया है. सीएम नीतीश कुमार ने 15वें वित्त आयोग द्वारा राज्यों से मांगे गए सुझावों से संबंधित पत्र के जवाब में एक बार फिर से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग रखी है. महागठबंधन को छोड़कर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने के बाद यह संभवतः पहली बार है, जबकि नीतीश कुमार ने अपनी इस वर्षों पुरानी मांग पर बात की है. नीतीश कुमार द्वारा एक सप्ताह के भीतर नोटबंदी और विशेष राज्य के दर्जे जैसे मुद्दे उठाने को सियासी जानकार अलग नजरिए से देख रहे हैं. लोग सवाल उठाने लगे हैं कि कहीं सीएम नीतीश कुमार का बीजेपी से मोहभंग तो नहीं होने लगा है? बता दें कि 15वें वित्त आयोग का गठन नवंबर 2017 में हुआ था. इसके एक महीने बाद ही दिसंबर 2017 में आयोग ने देश के सभी राज्यों को पत्र लिखा. इसमें वित्त आयोग द्वारा ऐसे सभी विचारणीय विषय जिस पर आयोग की सिफारिशें आधारित होंगी, पर राज्यों की राय एवं विशिष्ट सुझावों की मांग की गई. इस पत्र के जवाब में बिहार द्वारा भेजे गए पत्र के संदर्भ में सीएम नीतीश कुमार ने बिहार के विकास के प्रति केंद्र सरकारों के पक्षपातपूर्ण निर्णयों का जिक्र करते अपनी मांग रखी है.

वित्त आयोग को भेजे पत्र में क्या लिखा नीतीश ने
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 15वें वित्त आयोग का ध्यान खींचने के लिए लिखे गए अपने लेख में बिहार के पिछड़ेपन के कारणों का विस्तार से वर्णन किया है. उन्होंने लिखा है, ‘ऐतिहासिक रूप से पक्षपातपूर्ण नीतियों एवं विभिन्न सामाजिक एवं आर्थिक कारणों के चलते बिहार का विकास बाधित रहा है. वित्त आयोग एवं योजना आयोग के वित्तीय हस्तांतरण भी राज्यों के बीच संतुलन सुनिश्चित करने में असफल रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ा है. बिहार इसका सबसे बड़ा भुक्तभोगी रहा है.’ सीएम ने अपनी सरकार की सफलताएं गिनाते हुए कहा है कि तेजी से विकास के बावजूद बिहार देश के अन्य राज्यों के मुकाबले पीछे है. नीतीश कुमार ने कहा है, ‘पिछले 12-13 वर्षों में राज्य सरकार ने पिछड़ेपन को दूर करने तथा राज्य को विकास, समृद्धि एवं समरसता के पथ पर अग्रसर करने का अनवरत प्रयास किया है. इस अवधि में प्रतिकूल एवं भेदभावपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद राज्य ने दो अंकों का विकास दर हासिल करने में सफलता पाई है. तेजी से प्रगति करने के बावजूद बिहार, प्रति व्यक्ति आय तथा शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक एवं आर्थिक सेवाओं पर प्रति व्यक्ति खर्च में अभी भी सबसे निचले पायदान पर है.’

बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने पर दिया जोर
यदि अंतर-क्षेत्रीय एवं अंतरराज्यीय विकास के स्तर में भिन्नता से संबंधित आंकड़ों की समीक्षा की जाए तो पाया जाएगा कि कई राज्य विकास के विभिन्न मापदंडों यथा- प्रति व्यक्ति आय, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, सांस्थिक वित्त एवं मानव विकास के सूचकांकों, पर राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे हैं. तर्कसंगत आर्थिक रणनीति वही होगी जो ऐसे निवेश और अंतरण पद्वति को प्रोत्साहित करे, जिससे पिछड़े राज्यों को एक निर्धारित समय सीमा में विकास के राष्ट्रीय औसत तक पहुंचने में मदद मिले. हमारी विशेष राज्य के दर्जे की मांग इसी अवधारणा पर आधारित है. हमने लगातार केन्द्र सरकार से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग की है. बिहार को यदि विशेष राज्य का दर्जा मिलता है तो केन्द्र प्रायोजित योजनाओं में राज्यांश घटेगा जिससे राज्य को अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध होंगे, बाह्य संसाधनों तक पहुंच बढ़ेगी, निजी निवेश को कर छूट एवं रियायतों के कारण प्रोत्साहन मिलेगा, रोजगार के अवसर पैदा होंगे और जीवन स्तर में सुधार होगा. बिहार एक थलरुद्ध राज्य है और ऐसे ‘थलरुद्ध एवं अत्यधिक पिछड़े राज्य’ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विशेष एवं विभेदित व्यवहार के हकदार हैं. इस संदर्भ में 15वें वित्त आयोग को बिहार जैसे पिछड़े राज्य को राष्ट्रीय स्तर तक लाने के लिए संसाधनों की कमी को चिह्नित कर विशेष सहायता देने की आवश्यकता है.

बिहार और पिछड़े राज्यों को अलग नजरिए से देखे आयोग
सीएम नीतीश कुमार ने 15वें वित्त आयोग का ध्यान देश के विकसित और पिछड़े राज्यों के बीच आर्थिक असमानता की ओर भी दिलाया है. उन्होंने लिखा है, ’13वें वित्त आयोग ने राज्य की विशिष्ट आवश्यकताओं के लिए सहायता अनुदान की सिफारिश की थी, जिस पर 15वें वित्त आयोग को भी विचार करना चाहिए. यह पिछड़े राज्यों एवं विकसित राज्यों के बीच की खाई को पाटने में मदद करेगा. 14वें वित्त आयोग ने अपनी सिफारिशों में यह सुझाव दिया था कि यदि सूत्र आधारित अंतरण राज्य विशेष की विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति न कर सकें तो उसे निष्पक्ष ढंग से एवं सुनिश्चित रूप से विशेष सहायता अनुदान से पूरा किया जाना चाहिए. इस सुझाव को लागू नहीं किया गया है. अतः 15वें वित्त आयोग द्वारा बिहार जैसे पिछड़े राज्यों की विशेष एवं विशिष्ट समस्याओं को देखा जाना चाहिए.’ उन्होंने अपने लेख में इन मुद्दों को लगातार उठाने की भी बात कही है. नीतीश कुमार ने लिखा है, ‘मैंने लगातार इस मुद्दे को उठाया है कि 14वें वित्त आयोग की अनुशंसा के तहत राज्यों के अन्तरण को जो 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत किया गया है, वह मात्र एक संरचनात्मक परिर्वतन कम्पोजीशनल शिफ्ट है. एक ओर कर अन्तरणों में वृद्धि के कारण राज्यों की जो हिस्सेदारी बढ़ी वह दूसरी ओर केन्द्र सरकार द्वारा केन्द्रीय योजनाओं एवं केन्द्र प्रायोजित योजनाओं के आवंटन में कटौती के कारण काफी हद तक समायोजित हो गई. इसके अतिरिक्त राज्यवार जो अन्तरण पद्धति निर्धारित हुई उसके कारण बिहार का हिस्सा 10.917 प्रतिशत (13वें वित्त आयोग) से घटकर 9.665 प्रतिशत (14वें वित्त आयोग) हो गया. वस्तुतः पिछले 4 वित्त आयोगों की अनुसंशाओं में कुल देय कर राजस्व में बिहार की हिस्सेदारी लगातार कम हुई है- 11वें वित्त आयोग में 11.589 प्रतिशत से घटकर 12वें वित्त आयोग में 11.028 प्रतिशत, 13वें वित्त आयोग में 10.917 प्रतिशत और 14वें वित्त आयोग में 9.665 प्रतिशत हुई.’

नोटबंदी को लेकर नीतीश कुमार ने सुनाई खरी-खरी

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और भी कई अहम मुद्दों पर 15वें वित्त आयोग का खींचा ध्यान
हरित मिशन – नीतीश कुमार ने लिखा है कि कृषि रोड मैप के तहत हरियाली मिशन के अंतर्गत राज्य में हरित आवरण 9.79 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 15 प्रतिशत हो गया है. अब हमारा लक्ष्य इसे बढ़ाकर वर्ष 2022 तक 17 प्रतिशत करने का है जो कि बिहार जैसे अधिक जनसंख्या घनत्व वाले राज्य के लिए अधिकतम संभव है. अतः हरित आवरण को बढ़ाने के लिए राज्यों द्वारा किए जा रहे प्रयासों को प्रोत्साहित करने के लिए विशिष्ट अनुसंशा करना राज्य हित एवं राष्ट्रीय हित में होगा.

बाढ़ का मुद्दा – नेपाल एवं अन्य राज्यों से निकलने वाली नदियों के कारण हर साल आने वाली बाढ़ से बिहार को अतिरिक्त वित्तीय भार उठाना पड़ता है. ऐसे कारण जो बिहार के नियंत्रण में नहीं हैं, की वजह से राज्य को प्रत्येक वर्ष बाढ़ का दंश झेलना पड़ता है. बाढ़-राहत, पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण कार्यों पर काफी राशि खर्च होती है. अतः राज्यों की हिस्सेदारी से संबंधित मानदंडों के निर्धारण के दौरान इन बाह्य कारणों का समावेशन किया जाना चाहिए.

राज्य बंटवारे पर – आजादी के पहले बिहार में लागू प्रतिगामी स्थायी बंदोबस्ती व्यवस्था ने राज्य में सामाजिक एवं संरचनात्मक विकास को बाधित किया. आजादी के बाद मालवाहक भाड़ा सामान्यीकरण की नीति के कारण तत्कालीन बिहार को कच्चे माल की प्रचुर उपलब्धता एवं लागत-लाभ का फायदा नहीं मिल सका. इस अवधि में जबकि दक्षिण एवं पश्चिम भारत के तटीय राज्यों में आद्यौगिक विकास हुआ, बिहार पिछड़ेपन का शिकार रहा. बिहार के बंटवारे के बाद प्रमुख उद्योगों और खदानों के झारखंड में चले जाने के कारण यह समस्या और भी गंभीर हुई. बिहार पुनर्गठन अधिनियम 2000 में प्रावधान है कि विभाजन के फलस्वरूप बिहार को होने वाली वित्तीय कठिनाइयों के संदर्भ में एक विशेष कोषांग उपाध्यक्ष, योजना आयोग के सीधे नियंत्रण में गठित होगा और वह बिहार की आवश्यकताओं के अनुरूप अनुशंसाएं करेगा. अब योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग बना है. अतः अब नीति आयोग पर ही इस वैधिक प्रावधान को इसकी मूल अवधारणा के अनुरूप अक्षरशः लागू करने की जिम्मेवारी है.