नई दिल्लीः बिहार में 2015 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन बनाने में अहम भूमिका निभाने वाली कांग्रेस फिर से सीएम नीतीश कुमार और लालू यादव की पार्टी आरजेडी को मिलाने में मैच मेकर की भूमिका नहीं निभाएगी. इन दिनों मीडिया में ऐसी खबरें चल रही है कि नीतीश के नेतृत्व वाली जेडीयू और बीजेपी के बीच सब कुछ ठीक नहीं है और जेडीयू एक बार फिर नया रास्ता तलाश रही है. कांग्रेस ने राज्य इकाई के अपने नेताओं को भी स्पष्ट कर दिया है कि वे नीतीश की सरपरस्ती में न लगें. Also Read - कांग्रेस नेता हार्दिक पटेल राम मंदिर के लिए देंगे 21 हज़ार रुपए, कहा- धार्मिक हूं, कट्टरपंथी नहीं

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार कांग्रेस के प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल इस सप्ताह पटना जा रहे हैं. वह वहां प्रदेश इकाई के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात करेंगे. सूत्रों ने बताया है कि वे वहां अपने नेताओं को यह स्पष्ट करेंगे कि उन्हें सहयोगी पार्टी राजद की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए और मौजूदा राजद-कांग्रेस और जीतन राम मांझी के बीच गठबंधन को मजबूत करना चाहिए. Also Read - राहुल गांधी ने कहा- अर्थव्यवस्था में लोगों का विश्वास नहीं रहा, PM मोदी में मुश्किल से निपटने की योग्यता नहीं

कांग्रेस ने मौजूदा समय में नीतीश कुमार राजनीतिक उपयोगिता का भी मूल्यांकन किया है. पार्टी का मानना है कि 2014 के आम चुनाव में भाजपा की एकतरफा जीत ने राजद, जदयू और कांग्रेस को साथ आने पर मजबूर किया था लेकिन इस बार स्थिति बदली हुई नजर आ रही है. केंद्र और राज्य दोनों जगहों पर भाजपा के शासन और संघ की गतिविधियों के कारण ओबीसी, दलित और मुस्लिम समुदाय राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन के पक्ष में लामबंद हो रहा है. इस तबके में नीतीश के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है. दूसरी तरफ कांग्रेस नेतृत्व भी मानने लगा है कि नीतीश कुमार का राजनीतिक आधार लिमिटेड है और यहां तक कि उपेंद्र कुशवाहा उनसे बेहतर विकल्प हो सकते हैं. Also Read - फिलहाल राहुल गांधी नहीं संभालेंगे पार्टी की कमान, सोनिया कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष बनी रह सकती हैं

बिहार में जातीय समीकरण की बात करें तो नीतीश कुमार कुर्मी जाति से आते हैं वहीं उपेंद्र कुशवाहा कोइरी (कुशवाहा) जाति के नेता माने जाते हैं. कुर्मी और कोइरी दोनों जातियां एक दूसरे की करीब हैं और कई जानकार ये भी कहते हैं कि ये दोनों एक ही जाति की दो उपजातियां हैं. वोट प्रतिशत के मामले में कुशवाहा, कुर्मी पर भारी पड़ते हैं लेकिन अभी तक का ट्रेंड यह रहा है कि दोनों जातियां नीतीश को अपना नेता मानती हैं. नीतीश से अलग होने के बाद उपेंद्र कुशवाहा खुद को कुशवाहा जाति का नेता स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं.