नई दिल्ली. बिहार में शराबबंदी के 2 साल बाद नशे की लत छोड़ने के सकारात्मक प्रभाव नजर आने लगे हैं. लोगों के घरों में शराब पर खर्च होने वाले पैसे बच रहे हैं तो इससे एक तरफ जहां आर्थिक खुशहाली आ रही है, वहीं दूसरी ओर जीवनस्तर भी सुधर रहा है. यह हम नहीं कह रहे, बल्कि शराबबंदी के बाद के प्रभावों को जांचने के लिए सरकार द्वारा कराए गए अध्ययन में ये बातें सामने आई हैं. नई स्टडी की रिपोर्ट बताती है कि राज्य में शराबबंदी के बाद साल के शुरुआती छह महीने में ही महंगी साड़ियों, शहद और चीज़ की बिक्री गढ़ गई है. महंगी साड़ियों की बिक्री में जहां 1751 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, वहीं शहद की खपत 380 प्रतिशत और चीज़ की 200 प्रतिशत तक बढ़ गई है. यह अध्ययन एशियाई विकास अनुसंधान संस्थान (एडीआरआई) और सरकारी वित्त पोषित ज्ञान संस्थान विकास प्रबंधन संस्थान (डीएमआई) ने किया है. दोनों संस्थानों के अध्ययनों में यह भी पाया गया कि 19 प्रतिशत परिवारों ने उन पैसों से नई संपत्ति ली, जिसे वे पहले शराब पर खर्च कर दिया करते थे. सरकार ने दोनों संस्थानों को शराबबंदी के परिणामों का मूल्यांकन करने के लिए इस तरह का अध्ययन करने का निर्देश दिया था.

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शराबबंदी के बाद बढ़ी दूध और लस्सी की खपत
बिहार में अप्रैल 2016 में शराबबंदी लागू की गई थी. इसके दो साल बाद सरकार ने शराबबंदी के परिणामों की पड़ताल के लिए एडीआरआई और डीएमआई को इस अध्ययन की जिम्मेदारी दी थी. दोनों संस्थानों द्वारा किए गए अध्ययन को इसी साल विधानसभा में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण के साथ पटल पर भी रखा गया था. एडीआरआई ने अध्ययन के तहत कॉम्फेड (बिहार स्टेट मिल्क को-ऑपरेटिव फेडरेशन) की दुकानों पर हुई खरीदारी का विश्लेषण किया. कॉम्फेड को बिहार में ‘सुधा’ के नाम से जाना जाता है. इस अध्ययन में पाया गया कि शहद की खपत में 380 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी और चीज़ की खपत में 200 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. रिपोर्ट के अनुसार, दूध की बिक्री में 40 प्रतिशत, फ्लेवर्ड मिल्क की बिक्री में 28.4 प्रतिशत और लस्सी की बिक्री में 19.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

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महंगे कपड़े, फर्नीचर और प्रोसेस्ड फूड खरीद रहे लोग
एडीआरआई ने शराबबंदी के प्रभावों का अध्ययन करने के क्रम में बिक्री कर राजस्व के आधार पर कुछ अन्य उत्पादकों के बिक्री संबंधी आंकड़े भी जुटाए हैं. इसके अनुसार बिहार में शराबबंदी के बाद लोगों की जीवनशैली और उनके रहन-सहन के स्तर में सुधार देखा गया है. शराब छोड़ने के बाद घरों में सामान खरीदने, अपने ऊपर खर्च करने जैसी प्रवृत्ति में बढ़ोतरी देखी गई है. बिहार के लोग अब महंगे कपड़े, महंगी साड़ियां और प्रोसेस्ड फूड को दैनिक जीवन में अपनाने लगे हैं. एडीआरआई के अनुसार शराबबंदी के बाद महंगी साड़ियों की बिक्री में 1751 प्रतिशत, महंगे कपड़े में 910 प्रतिशत, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ में 46 प्रतिशत, फर्नीचर में 20 प्रतिशत और खेल संबंधी सामान की बिक्री में 18 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है. यह रिपोर्ट बताती है कि शराब छोड़ने वाले लोगों के घरों में राज्य सरकार के इस कानून ने सकारात्मक प्रभाव छोड़ा है. नशे पर खर्च होने वाला पैसा अब लोगों के जीवन में समृद्धि ला रहा है.

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शराबबंदी के बाद खर्च करने की प्रवृत्ति बढ़ी
शराबबंदी कानून के अमल में आने के बाद जिन लोगों ने नशा करने की आदत छोड़ी, उससे उनके दैनिक जीवन में भी सकारात्मक बदलाव आया. शराबबंदी के बाद के परिणामों का अध्ययन करने वाली संस्था डीएमआई के एक अध्ययन में ‘शराबबंदी के अर्थव्यवस्था पर पड़े ठोस प्रभाव’ को भी रेखांकित किया गया. डीएमआई का अध्ययन पांच जिलों नवादा, पूर्णिया, समस्तीपुर, पश्चिम चम्पारण और कैमूर के 2,368 परिवारों से एकत्रित प्राथमिक आंकड़े पर आधारित है. इसमें कहा गया है कि शराबबंदी के बाद परिवारों द्वारा प्रति सप्ताह 1331 रुपए खर्च किए जाने की खबर है. वहीं, शराबबंदी से पहले हर सप्ताह खर्च की जाने वाली औसतन राशि 1005 रुपए थी. अध्ययन के अनुसार शराबबंदी के बाद 19 प्रतिशत परिवारों ने नई संपत्ति खरीदी और पांच प्रतिशत ने अपने घरों की मरम्मत कराई.

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कानून के बाद बढ़ा महिलाओं का सम्मान
डीएमआई के अध्ययन के अनुसार, 58 प्रतिशत महिलाओं ने पाया कि शराबबंदी कानून लागू होने के बाद उन्हें अधिक सम्मान दिया गया. परिवार संबंधी निर्णय लेने में भी उनकी भूमिका बेहतर रही. वहीं 22 प्रतिशत महिलाओं का कहना है कि केवल परिवार के मामलों में ही नहीं, बल्कि गांव से जुड़े मामलों में भी उनकी राय ली जा रही है. अपराध के मामलों में एडीआरआई ने पाया कि अपहरण के मामलों में 66.6 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि हत्या के मामलों में 28.3 प्रतिशत और डकैती के मामलों में 2.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. वर्ष 2011 के आंकड़ों के आधार पर अप्रैल 2016 में जब शराबबंदी लागू हुई तब राज्य में कम से कम 44 लाख लोग शराब पीते थे. एडीआरआई के अध्ययन के अनुसार इनमें से प्रत्येक व्यक्ति शराब पर प्रति माह कम से कम 1000 रुपए जरूर खर्च करता था. अध्ययन के अनुसार इस अनुमान के आधार पर अब प्रत्येक महीने 440 करोड़ रुपए बचाए जा रहे हैं.