नई दिल्ली. 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में देर है, लेकिन बिहार में अभी से ही सत्तारूढ़ राजग के बीच सियासी रार-तकरार शुरू हो चुकी है. राज्य में भाजपा की अगुआई वाले एनडीए का चेहरा सीएम नीतीश कुमार को बनाने को लेकर लग रहा है कि इस सत्तारूढ़ गठबंधन में ‘सब कुछ’ सही नहीं है. भाजपा और जदयू दोनों खुद को ‘बड़ा भाई’ बताने में जुटी हुई है, लेकिन आंकड़ों में इसे साबित करना दोनों के लिए टेढ़ी खीर है. जेदयू की मांग और अन्य सहयोगी दलों की मौजूदा स्थिति को देखते हुए भाजपा के लिए केवल 6 सीटें बचती हैं, जबकि मौजूदा समय में राज्य में भाजपा के 22 सांसद हैं. Also Read - Bihar Assembly Election 2020: भाजपा के मेनिफेस्टो पर मचा बवाल, तो BJP ने किया पलटवार

लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बिहार में 40 सीटों का बंटवारा दोनों ही दलों के लिए कठिन है. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य में सबसे ज्यादा सीटें जीती थीं, लेकिन एक साल बाद 2015 के विधानसभा चुनाव में जदयू ने महागठबंधन में रहते हुए अपनी पकड़ ज्यादा मजबूत कर ली. हालांकि इन दोनों ही चुनावों में भाजपा का वोट शेयर, जदयू के मुकाबले ज्यादा रहा है, लेकिन विधानसभा सीटों के आधार पर अब जदयू खुद को बड़ी पार्टी (बड़ा भाई) मान रही है. जदयू नेता व सीएम नीतीश कुमार ने अभी इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया है. लेकिन उनकी राजनीतिक गतिविधियों को जानने वाले लोग बताते हैं कि यदि ऐसी ही स्थिति रही तो भाजपा के लिए नीतीश को साधना बड़ी चुनौती होगी. Also Read - बिहार में मुफ्त वैक्सीन बांटने के वादे पर राहुल गांधी का बीजेपी पर हमला, RJD बोली- इसमें भी चुनावी सौदेबाजी, छी-छी

2009 के फॉर्मूले पर जदयू
वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी आज ही की तरह बिहार में जदयू और भाजपा की सरकार थी. नेतृत्व करने वाले नेता भी नीतीश कुमार और सुशील मोदी ही थे. उस समय जदयू को भाजपा के मुकाबले ज्यादा सीटें मिली थीं. जदयू ने 25 सीटों पर चुनाव लड़ा था तो भाजपा के हिस्से में 15 सीटें आई थीं. इस चुनाव में जदयू को 25 में से 20 और भाजपा को 15 में से 12 सीटों पर जीत मिली थी. हाल के दिनों में जदयू नेताओं के बयान से लगता है कि पार्टी इसी फॉर्मूले को वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भी आजमाना चाहती है. लेकिन देश की स्थितियां और भाजपा का सामर्थ्य-बल अब बदल चुका है. या यों कहें कि बढ़ चुका है. और वैसे भी एनडीए की अगुआई भाजपा ही करती है, ऐसे में भाजपा के लिए जदयू के फॉर्मूले को मान लेना आसान नहीं होगा. वहीं इससे पहले 2004 के लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियों के बीच 26-14 का फॉर्मूला तय हुआ था. Also Read - Bihar Assembly Election: बिहार में कोरोना वैक्सीन मुफ्त बांटने के वादे से बवाल, बीजेपी के खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत

2014-2015 के वोट शेयर भाजपा के पक्ष में
वर्ष 2010 और 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान जदयू भले बिहार की सत्ता चलाने में ड्राइविंग सीट पर रहा हो, लेकिन इन्हीं दिनों में भाजपा बिहार समेत देश के अन्य स्थानों पर खासी मजबूत पार्टी बनकर सामने आई है. खासकर 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी-युग की शुरुआत के बाद से तो भाजपा पूरे देश में अकेली सबसे मजबूत पार्टी के रूप में स्वीकार्य हो रही है. यही वजह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव और 2015 के विधानसभा चुनाव में बिहार में भाजपा का वोट शेयर बढ़ गया है. वहीं, इन्हीं चुनावों में जदयू ऊपर-नीचे होती रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू ने भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ा था. पार्टी को प्रदेश में 2 सीटों पर जीत मिली और वोट शेयर 16 प्रतिशत के आसपास रहा. वहीं भाजपा लोकसभा चुनाव में 29 सीटों पर लड़ी जिसमें से 22 पर उसे जीत मिली. जदयू के मुकाबले उसका वोट शेयर, 29.86 प्रतिशत, रहा था. ऐसे में यह बात बेमानी लगती है कि ज्यादा वोट शेयर वाली पार्टी भाजपा, जदयू के सामने खुद को कमतर कैसे आंकेगी. क्या वह बिहार में एनडीए गठबंधन के तहत कम सीटों पर चुनाव लड़ पाएगी?

राजग के लिए नीतीश कुमार को साधना कड़ी चुनौती के रूप में सामने आएगा.

राजग के लिए नीतीश कुमार को साधना कड़ी चुनौती के रूप में सामने आएगा.

 

…तो क्या सिर्फ 6 सीटों पर लड़ेगी भाजपा
बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं. अभी इनमें से 22 पर भाजपा, रामविलास पासवान की लोजपा के पास 6, उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा के पास 3 सीटें हैं. जदयू के पास सिर्फ 2 सीटें हैं. जदयू को छोड़कर राजग के पास कुल 31 सीटें हैं. 2019 के चुनावों के संदर्भ में जदयू की मांग पर गौर करें तो जदयू 25 सीटों पर खुद चुनाव लड़ना चाहती है. यानी राजग के सहयोगी दलों को बाकी 15 सीटों से ही काम चलाना होगा. ऐसे में अगर लोजपा और रालोसपा अपनी 9 सीटें न छोड़ें तो भाजपा के लिए कुल जमा 6 सीटें ही बचती हैं. इस आंकड़े पर भाजपा शायद ही राजी हो पाए. यानी ये फॉर्मूला तो लागू होने से रहा. दूसरी तस्वीर वर्तमान सीट बंटवारे की है. यदि राजग के सभी दल अपनी-अपनी जीती हुई सीटों पर मान जाएं तो जदयू के हिस्से में 9 सीटें आती हैं. क्या इन 9 सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए जदयू तैयार होगा? क्या भाजपा अपनी सीटें कम करके जदयू को देगी? क्या लोजपा और रालोसपा, दोनों पार्टियों की सीटों की संख्या में कमी की जाएगी? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनको लेकर बिहार में अगले कुछ दिनों या महीनों तक चर्चाएं चलेंगी. सियासी जानकार इसके जवाब ढूंढ़ेंगे. भाजपा ज्यादा चिंतित होगी, क्योंकि राजग की सबसे बड़ी पार्टी तो वही है.

मामले पर बोलने से बच रहे नीतीश
भाजपा और जदयू के बीच सीटों के तालमेल के मुद्दे पर हालिया राजनीति पर बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने अभी तक कोई टिप्पणी नहीं की है. यहां तक कि कल पटना में इफ्तार पार्टी के दौरान सीएम नीतीश कुमार को राज्य में भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए के चेहरे के तौर पर पेश किए जाने की जदयू की मांग को लेकर पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवालों को भी नीतीश कुमार टाल गए. नीतीश ने पत्रकारों के सवाल के जवाब में कहा, ‘यह एक खास मौका है जब मैं सभी के चेहरे पर खुशी देखना चाहूंगा. किसी और चेहरे के बारे में कृपया अभी सवाल नहीं करें.’ नीतीश ने कहा, ‘आपके सभी सवालों के जवाब उचित समय पर दिए जाएंगे. अभी दुआ करें कि रमजान का महीना बिहार में अमन-चैन लेकर आए.’ इससे पहले, दिन में उप-मुख्यमंत्री एवं भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने कहा कि नीतीश राज्य सत्ताधारी गठबंधन के नेता हैं और एनडीए 2019 के आम चुनावों में जदयू अध्यक्ष नीतीश और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामों के आधार पर वोट मांगेगा.